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टिकट महात्म्य-कथा

टिकटार्थी महात्म्य की कथा फिलहाल मैं देख रहा हूं कि पार्टी दफ्तरों के सामने क्यू में खड़े होकर अपने बायोडाटा रूपी शंख फूंक रहे हैं। कहना मुश्किल है कि कौन टिकटार्थी कब क्या बोलेगा-आंय-बांय-सांय। टिकटार्थी तरह-तरह के पैतर भांप रहे हैं। उनमें से कब कौन क्या कर बैठेगा कहना मुश्किल है। सभी अपने समर्थकों, चमचों और कलछुल और डब्बुओं के साथ चहक रहे हैं। पल-प्रतिपल अपने रंग बदल रहे हैं। गिरगिट भी हैरान हैं, उन्हें देख-देखकर। यदि यही उनका हाल रहा तो उनकी प्रजाति घड़ियालों की तरह शीघ्र ही लुप्त हो जायेगी।ड्ढr ड्ढr राजन! कविता सुनेंगे? धृतराष्ट्र ने कहा-मगर वैसी नहीं जो आजकल के कुछ कवि सुनाते हैं, जो केवल मित्र-कवियों को सुनाने के वास्ते लिखी जाती है, जिन्हें सुनने से कभी-कभी श्रोता मूच्र्छित जैसे हो जाते हैं। संजय ने कहा-मैं ऐसी घृष्टता भला आपसे कैसे कर सकता हूं, तो सुनिये ‘भारत दुर्दशा’ के तर्ज पर रचित यह जन कविता शीर्षक है ‘कार्यकर्ता दुर्दशा’।ड्ढr हाय रे जमाना,ड्ढr तपे-तपाये कार्यकर्ताओं के भाग्य में केवल झंडा उठाना, नार लगाना, सूखे बंदनवार चबानाड्ढr जय-जयकार चगुराना, आश्वासनों का लॉलीपाप चुभलानाड्ढr कभी-कभी इस राजा के साथ, कभी उस रानी के साथ, अश्वमेध का घोड़ा बन हिनानाना, हाय र जमाना, तपे-तपाये कार्यकर्ताओं के भाग्य में केवल झंडा उठानाड्ढr ड्ढr धृतराष्ट्र ने कहा, बस-बस संजय, अब आगे कुछ मत सुनाना। संजय ने कहा-नहीं राजन आपको कुछ और पंक्ितयां सुननी ही पड़ेगी। कुछ कार्यकर्ताओं, जो आजकल उल्लसित हैं, उन्हें देखकर तो बाबा नागाजरुन की वह कविता याद आती है, आये हैं दिल्ली से टिकट मार केआंखों में फिर से सपने छाये हैं बहार के ..बड़े-बड़े बंगले, मोटर कार के आये हैं दिल्ली से टिकट मारके।

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  • Web Title: चुनावी गीता