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परिवार : बढ़ते तलाक से टूटतीं कड़ियां

भारत में शादियां टूटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पति-पत्नी में झगड़े के कारण पिछले एक दशक में देश भर में तलाक दर तीन गुना हो गई है। दिल्ली को तो तलाक की राजधानी कहा जाने लगा है। यहां पिछले वर्ष तलाक के नौ हाार मामले दर्ज हुए। अनुमान है कि दिल्ली की पारिवारिक अदालतों में हर वर्ष दस हाार से अधिक तलाक की अर्जियां डाली जाती हैं। मुंबई में तो स्थिति और भी बुरी है। वहां सन् 2002 के बाद प्रतिदिन यदि पांच शादियां पंजीकृत होती हैं तो तलाक के दो मामले भी दर्ज होते हैं। बेंगलुरु में सालाना पांच हाार और मुंबई में चार हाार अर्जियां डाली जाती हैं। यहां तक कि सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य केरल तथा पंजाब व हरियाणा में भी तलाक के मामले बढ़े हैं। कई लोग इसका पूरा दारोमदार शिक्षित कामकाजी महिलाओं पर डालते हैं। यह सच है कि टकराव का कारण धैर्य की कमी और अहं होता है और इसी कारण कई बार तलाक की नौबत आ जाती है। यह भी कि वैश्वीकरण, आर्थिक उदारीकरण और सामाजिक-नैतिक मूल्यों में आए बदलाव के कारण महिलाओं की सोच बदली है। अपने अधिकारों के प्रति भी वे जागरूक हुई हैं। और अब अपनी गरिमा से वे घटिया समझौता नहीं करना चाहतीं। पति परमेश्वर और सात जन्मों के साथ जसे जुमले अब उन्हें रास नहीं आते। अपने स्वतंत्र अस्तित्व, करियर और गरिमा को बनाए रखने के प्रति वे सजग हैं। पर इसका अर्थ यह कतई नहीं कि वे पति के साथ रहना नहीं चाहतीं। वे दाम्पत्य तो चाहती हैं, पर अत्याचार सह कर नहीं। सच्ची सहभागिता तभी संभव है जब एक-दूसर के प्रति प्रेम व विश्वास हो। विवाह संस्था पर मंडरा रहे इस संकट से चिंतित अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन रक्षक ने तो चेतावनी दे दी है कि अगर समय रहते इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो तलाक के मामले में भारत विश्व का अग्रणी देश बन जाएगा। बढ़ते भौतिकवाद, लड़के-लड़कियों में भेदभाव, आसमान छूती महत्वाकांक्षाओं और तनावपूर्ण पेशेवर जिंदगी ने मनुष्य को स्वार्थी और आत्मकेंद्रित बना दिया है। पति-पत्नी की एक-दूसर से उम्मीदें बढ़ गई हैं। जब उन्हें लगता है कि उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हो रहीं तो वे धैर्य रखने व एक-दूसर को समझने की बजाय तलाक लेना बेहतर समझते हैं। अब प्यार और विवाह की परिभाषा बदल गई है। अधिकांश दंपती आपसी संबंधों की गरमाहट को भूल कर एक अनजानी खुशी की तलाश में भटक रहे हैं। कई बार तो विवाह के कुछ समय बाद ही पति-पत्नी के बीच मनमुटाव शुरू हो जाता है। एसे-एसे किस्से सामने आते हैं कि लगता है विवाह का मकसद पत्नी को नीचा दिखाना या फिर पैसा हड़पना था। पहले बात ढंक दी जाती थी, पर अब वह असंभव है। यही वजह है कि अब शादी के नाम पर पढ़ी-लिखी युवतियों के मन में अनजाना भय भी घर करने लगा है। परिचित और करीबी रिश्तेदार भी पहले की तरह रिश्ते कराने में कतराने लगे हैं। शादी दो परिवारों का संबंध न रहकर लेन-देन का व्यवसाय बन जाए और परस्पर प्रेम और विश्वास का स्थान शक और अहं ले ले तो हर चीज पैसे से तौली जाने लगती है और तब टूट बढ़ती है। यह स्वीकार करने की बजाय आज भी कुछ लोगों का मानना है कि महिलाओं के सशक्ितकरण के नाम पर ही परिवार यूं टूट रहे हैं और टकराव बढ़ रहा है। अक्सर दहेा कानून के लड़की वालों द्वारा दुरुपयोग का आरोप भी लगता है। (पुरुषों के एक संगठन ने तो इसके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।) कानून के दुरुपयोग की बात कुछ हद तक सच मानी जा सकती है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि ज्यादातर लड़कियों के लिए इस कानून ने कवच का काम किया है। जांच के बाद भी अधिकांश मामलों में पुरुष और उसका परिवार ही दोषी पाए जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शादी का पंजीकरण कराने और साथ ही स्त्री-धन व विवाह में दिए जाने वाले सामान की पूरी सूची जमा कराने का सुझाव दिया था, जिस पर अभी भी कायदे से अमल नहीं किया जाता। अगर शादियां टूटने से बचानी हैं तो उस सुझाव पर अमल किया जाना चाहिए। साथ ही स्कूलों में नैतिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को सिखाया जाना चहिए कि वैवाहिक जीवन को कैसे सफल बनाया जा सकता है। विवाह संबंधी सार मामलों का फैसला एक ही अदालत में लाया जाना भी जरूरी है। विवाह से पूर्व लड़के-लड़की के साथ-साथ भावी सास-ससुर की काउंसिलिंग भी आवश्यक है। क्योंकि अपने भविष्य की सोच कर पति-पत्नी तो एक-दूसर से अलग हो जाते हैं, लेकिन बच्चों के भविष्य की चिंता कोई नहीं करता। इनका अपना जीवन तो प्रभावित होता ही है, तलाक का सबसे ज्यादा खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। ह्यह्वह्यद्धद्वड्ड1ड्डrद्वड्डञ्चद्धन्ठ्ठस्र्ह्वह्यह्लड्डठ्ठह्लन्द्वद्गह्य.ष्oद्वड्ढr लेखिका हिन्दुस्तान में एसोसियेट एडिटर हैं

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