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लोकसभा चुनाव यानी अंधों का हाथी

पंद्रहवीं लोकसभा बन चुकी है। दो दिन पहले तक चुनाव लड़वा रहा मीडिया अब सरकार बनवा रहा है। किसने किसको फोन किया, किसने किससे मुलाकात की, कौन किसको देखकर मुस्कुराया, यह सब चुनावी अटकलों के विषय हैं। यह सिलसिला आज का नहीं, दो महीने पुराना है- इन दो महीनों में मीडिया पर चुनाव की खबरों के नाम पर लोग लगभग एक शोर सुनते रहे, जिसमें सही आवाजों की पहचान जितनी मुश्किल लगती रही, सही आशयों की समझ उससे भी ज्यादा मुश्किल। आखिर इस शोर की वजह क्या है? एक-एक हरकत को पढ़ने, एक-एक कदम का मतलब निकालने, एक-एक बयान के माने खोजन का यह उत्साह कितना राजनीति की सच्ची समझ से प्रेरित है और कितना चुनाव को तमाशा, मसाला, चाट या ऐसा ही कुछ समझने-बनान की रणनीति से? इसमें राजनीति को बहुत करीब से जानने-समझन का आत्मविश्वास कम दिखता रहा और यह अंदेशा ज्यादा बड़ा कि कहीं राजनीति का यह हाथी हमारे अंधेपन के आगे इतना विराट साबित न हो कि उसका आकार-प्रकार हम समझ ही न सकें। इसीलिए एक-एक अंग टटोल कर मीडिया अपने-अपने हाथी और अपनी-अपनी सरकारें बनाता रहा। और इस हाथी का करीब से जानन का सबसे आसान तरीका क्या रहा? राजनीति की भाषा, नेताओं की देहभाषा। एक-एक वक्तव्य को लपक लेन की हड़बड़ी, एक-एक मुद्रा को पढ़ लेने की बेताबी बनाती रही लोकसभा चुनावों से जुड़ी खबरें। इन्हीं के आधार पर मीडिया तय करता रहा, कौन किसके साथ खड़ा है, कौन किसके खिलाफ। कौन किससे किस हाल में जुड़ेगा, कौन किससे किस सूरत में टूट जाएगा। किसे प्रधानमंत्री पद चाहिए, किसे सीबीआई पर नियंत्रण। वैचारिक पक्षधरताएं भी इसी सतही ढंग से तय होती रहीं। नीतीश कुमार ने जब नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार करने से रोका तो वे यूपीए के साथ जान की गली तलाशते दिखे और जब लुधियाना में नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाया तो एनडीए के अपने घर लौटते नजर आए। ध्यान से देखें तो ये सतही और हड़बड़ाए हुए नतीजे मीडिया का स्वभाव बन गए हैं। भारतीय लोकतंत्र में चुनावों की अपनी सामूहिकता और उत्सवधर्मिता है- और लोकसभा के चुनाव तो बिल्कुल राष्ट्रीय पर्व है- लकिन कोई भी पर्व, कोई भी उत्सव कोरा कर्मकांड नहीं होता, उसके अपने गहरे आशय, उसकी अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक अनुगूंज, उसकी अपनी जातीय स्मृति होती है। मीडिया उत्सव तो दिखाता रहा, उड़ती कीचड़ और धूल भी पेश करता रहा, लकिन वे गहरे आशय उसके पाठ में अलक्षित रह गए, जिनसे लोकतंत्र के संकटों या उसकी संभावनाओं को सही अथोर्ं में समझा जा सके। दरअसल. नेताओं के लिए भी यह आसान होता है कि वे चुनावों को किसी लहर में बदल दें, किसी टकराव में, किसी वाक्यु में सीमित कर दें। यह मुद्दों और विचारों से भागन का सबसे सुविधाजनक रास्ता है। दुर्भाग्य से नेताओं के पीछे चलने वाला मीडिया भी इस सुविधानजक रास्त का अनुसरण करता रहा और चुनाव के अलग-अलग मुहावरे बनाता रहा। इसलिए करीब दो महीनों तक चले इस चुनावी संग्राम में बातें सबस कम हुईं, जुमले सबसे ज्यादा उछले। मुसलमानों पर वरुण की राय, वरुण पर मायावती की राय, माया पर मनका की राय, मनका पर माया की राय, नीतीश पर राबड़ी की राय, कांग्रेस पर मोदी की राय, मोदी पर कांग्रेस की राय, आडवाणी पर मनमोहन की राय, मनमोहन पर आडवाणी की राय- मीडिया इसी खुराक से पलता रहा। लकिन अब जनता की राय आ गई है। और वह बता रही है कि हमेशा की तरह इस बार भी उसका ठीक-ठीक भाष्य करने में मीडिया से चूक हुई है। यही नहीं, वह अपनी सुविधा से चुनाव को दो खेमों में- आडवाणी बनाम मनमोहन में या यूपीए बनाम एनडीए में- बांटता रहा और मसाल की तरह तीसरे और चौथे मोचोर्ं को देखता रहा। लकिन चुनावों को दो ध्रुवीय बनान के इस खेल को जनता हमेशा बहुध्रुवीय बनाती रही। राजनीति और मीडिया की इस शिकायत से बेखबर या बेपरवाह कि इन चुनावों में कोई एक बड़ा मुद्दा नहीं है, कोई एक बड़ी लहर नहीं है। उसे मालूम था कि उसे किसलिए किसे वोट देना है। दरअसल, चीजों को देखन का अपना एक परिप्रेक्ष्य होता है। बहुत दूर से ही चीजें अस्पष्ट नहीं होतीं, आंख बहुत सटा लेने से भी धुंधली पड़ जाती हैं। मीडिया जैसे बिल्कुल आंख सटाकर इस चुनाव को देखन की कोशिश में है। यह कोशिश उसके लिए खुले मैदान के खेल को भी अजूबे में बदल डालती है और बंद कमरे की रणनीति को भी एक पहेली बना देती है। ऐसे बंद कमरों में किन्हीं झिर्रियों से झांकता मीडिया अपने आधे-अधूरे अवलोकनों को पूरा सच बनाकर पेश करता है और जब कमरा खुलता है तो उसकी अपनी असलियत सामने आ जाती है।

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