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12 जुलाई, 2020|10:33|IST

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जान पे आफत हो तो जान लेना जायज

जान पे आफत हो तो जान लेना जायज

उच्चतम न्यायालय ने एक अहम फैसले में कहा है कि जब किसी व्यक्ति की जान पर बन आई हो तो उससे कायरतापूर्ण आचरण की उम्मीद नहीं की जा सकती और आत्मरक्षा में उसे हमलावर की जान लेने का पूरा हक है।

न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने कहा कि इन स्थितियों में कानून हमलावर की जान लेने की इजाजत देता है और इसे हत्या का अपराध नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि कानून किसी कायदा पसंद इन्सान से ऐसी स्थिति में जबकि उसकी जान पर बन आई हो, बुजदिली की उम्मीद नहीं करता। यह अदालत पहले भी कई बार कह चुकी है कि खतरा आने पर पीठ दिखाकर भाग जाना व्यक्ति की गरिमा को कम करता है। फैसले में पीठ ने कहा कि इसलिए आत्मरक्षा के अधिकार के सामाजिक उद्देश्य हैं और इनका इस्तेमाल दायरे में रहकर किया जाना चाहिए।

पंजाब के लुधियाना जिले में 15 जुलाई 1991 को इस मामले के आरोपी दर्शन सिंह ने जमीन के एक झगड़े में अपने चाचा गुरचरण सिंह की जान ले ली थी। शीर्ष अदालत ने इस फैसले के साथ ही दर्शन सिंह को बरी कर दिया।

दर्शन ने गुरचरण को पिता पर धारदार हथियार से हमला करने के बाद अपनी तरफ बढ़ते देख उसे गोली मार दी थी। निचली अदालत ने आईपीसी के प्रावधानों के तहत यह माना कि दर्शन सिंह ने आत्मरक्षा में गुरचरण की जान ली थी और उसे बरी कर दिया। बाद में फैसले के खिलाफ अपील किए जाने पर उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए दर्शन सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई।

उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दर्शन की अपील पर शीर्ष अदालत ने आईपीसी की धारा 96 से धारा 106 की व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान का सहारा उन हालात में लिया जा सकता है जबकि किसी व्यक्ति को इस बात का वास्तविक अंदेशा हो कि उसका प्रतिद्वंदी उस पर हमला करने जा रहा है और इस हमले से उसे गंभीर शारीरिक क्षति पहुंच सकती है।

पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति आत्मरक्षा में हमलावर की जान लेने की हद तक जा सकता है। भले ही उस पर कोई प्रहार न हुआ हो या उसे कोई चोट नहीं पहुंची हो। अदालत ने कहा कि यह सवाल कि खतरे की आशंका कितनी वाजिब थी, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस सिलसिले में कोई तयशुदा फॉर्मूला नहीं बनाया जा सकता।

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