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ययाति

महाभारत के एक प्रमुख कथानक के नायक का नाम ययाति है। ययाति का चरित्र हमारे पौराणिक आख्यान में भोग का प्रतीक बन जाता है। उसकी दो पत्नियाँ थीं। देवयानी और शर्मिष्ठा। हमारे पौराणिक आख्यानों में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की इकलौती पुत्री देवयानी थी। नहुष का पुत्र ययाति राजकुमार है। देवयानी कुएं में गिर जाती है। ययाति उधर से ही गुजर रहे हैं। वे उसे कुएं से निकाल देते हैं। देवयानी उनसे विवाह करने का प्रस्ताव रखती है। देवयानी और ययाति का विवाह सम्पन्न होता है, परंतु वह अपनी सहेली शर्मिष्ठा को अपनी सेवा के लिए मांग लेती है। शर्मिष्ठा के पिता ना नहीं कर सकते थे। उन्होंने अपनी सर्वगुण सम्पन्न बेटी को अपने गुरु की बेटी की दासी बनाकर भेज दिया। ययाति अपनी पत्नी के साथ शर्मिष्ठा से भी प्रेम करने लगता है। दोनों के बच्चे होते हैं। एक दिन देवयानी उन बच्चों को देख लेती है। उसे जब पता चलता है कि वे बच्चे उसकी दासी मित्र शर्मिष्ठा के हैं, वह अपने पिता के घर चली जाती है। देवयानी के पिता क्रोधित होकर जमाई को शाप देते हैं- तुम अभी वृद्धावस्था को प्राप्त हो। ययाति तत्क्षण वृद्ध हो जाता है। पर वह गिड़गिड़ाता है- ‘मेरी भोगेच्छाएं अभी पूर्ण नहीं हुई हैं। अपनी सांसारिक अतृप्त भोगेच्छा को लेकर स्वर्ग भी नहीं जा सकता।’ शुक्राचार्य कहते हैं- ‘यदि तुम्हारा कोई पुत्र तुम्हें अपनी जवानी दे दे तो तुम भोगेच्छाओं की तृप्ति कर सकते हो।’ ययाति अपने पुत्रों से जवानी मांगता है। शर्मिष्ठा का पुत्र पुरू उसे जवानी देता है। कथा के अनुसार हजारों वर्षों तक पुन: जवान रहकर ययाति भोग विलास करते हैं, पर भोगेच्छाएं तृप्त नहीं होतीं। वे पुरू को उसकी जवानी लौटाते हैं और अपने जीवनानुभव की सीख देते हैं- ‘‘न जातु काम: कामानुपभोगेन शाम्यतिड्ढr हविषा कृष्णवत्र्मेव भूय एवाभिवर्धते॥’’ भोग की कामनाएं भोग से समाप्त नहीं होतीं। वे और बढ़ती जाती हैं। जैसे अग्नि में हविस डालने से अग्नि प्रज्वलित होती है, बुझती नहीं। भोगेच्छाओं पर नियंत्रण आवश्यक होता है। त्याग करना। छोड़ना। पर यह अभ्यास से होता है।

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  • Web Title: ययाति