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बांग्लादेश में बगावत की हकीकत

फिलहाल ऐसा लगता है कि बांग्लादेश में भारी संकट टल गया है- सहसैनिक बांग्लादेश राइफल्स के बागी सिपाहियों ने हथियार डाल दिये हैं, हालांकि दर्जनों अफसरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। यह सुनने को मिल रहा है कि बौखलाए हुए सिपाहियों की सबसे बड़ी शिकायत तनख्वाह को लेकर थी और थोड़ी नाराजगी इस बात से भी थी कि तमाम आला अफसर सेना से लाकर थोपे गए अधिकारी थे। यह किसी से छिपा नहीं कि बांग्लादेश राइफल्स की छवि एक अनुशासित फौजी टुकड़ी वाली नहीं बल्कि छुट्टे सांडों जैसी है। कुछ वर्ष पहले भारत-बांग्लादेश सीमा पर इनके निरंकुश आचरण से गंभीर संकट पैदा हो गया था। फौज हो या सहसैनिक दस्ते, बांग्लादेश में इनकी सहानुभूति शेख हसीना के साथ नहीं बल्कि उनकी जन्मजात शत्रु फौजी जनरल की बेवा खालिदा जिया के साथ ही है। यह सोचना तर्कसंगत है कि वेतनमान और सेवा की सुविधा के अलावा बगावत की सुगबुगाहट के कारण कुछ और भी रहे हैं। एक और चिंताजनक बात यह है कि बागियों को आर्थिक सहायता पहुंचाने वाले एक षड्यंत्रकारी व्यक्ित की पहचान पाकिस्तान में रहने वाले एक अरबपति जहाज मालिक के रूप में की गई है जिसके घनिष्ठ संबंध पाकिस्तानी सेना के साथ बतलाए जाते हैं। इसे मात्र संयोग नहीं समझा जा सकता। जबसे बांग्लादेश का जन्म हुआ है, तभी से पाकिस्तान के फौजी तानाशाह इस बात से बेहद खिन्न रहे हैं कि कितनी आसानी से धर्म के आधर पर निर्मित उनके राष्ट्र-राज्य का विखंडन हो गया। वह इसके लिए अपने उत्पीड॥क शासन और बंगालियों के नरसंहार को जिम्मेदार नहीं ठहराते और आज लगभग चार दशक बीतन के बाद भी इसका ठीकरा भारत के सर ही फोड़ते हैं। विडंबना यह कि दूसरी तरफ बांग्लादेश में वर्तमान पीढ़ी और शासक वर्ग के अधिकांश सदस्य खुद को भारत का ऋणी नहीं समझते बल्कि जा कोई भारत के प्रति मित्रता का भाव दर्शाता है, उसे विभीषण की तरह देशद्रोही समझा जाता है। इसका खामियाजा शुरू से ही शेख हसीना को भुगतना पड़ा है। शेख हसीना के पिता मुजीबुर रहमान ने बांग्लादेश की स्थापना एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में की थी और उन्हें भारत के प्रति आभार प्रकट करने में कभी कोई संकोच नहीं हुआ। जब उनकी सपरिवार नृशंस हत्या हुई थी, उस वक्त भी यह बात उठी थी कि खून-खराबे वाला यह तख्तापलट पाकिस्तान के बैरी इस कांट को राह से हटान के लिए ही हुआ था। कुल मिलाकर हसीना शेख मुजीब की उत्तराधिकारी है और उनका सत्ता में लौटना बांग्लादेश में इन सभी तत्वों के लिए सरदर्द पैदा करता रहा है। भारत की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि चुनाव वाले वर्ष में आंतरिक राजनीतिक दबाव हमारी विदेश नीति को पथभ्रष्ट करते रहे हैं। इस बात का सबसे दर्दनाक उदाहरण है श्रीलंका में चल रहा गृहयुद्ध। डीएमके के आग केन्द्र सरकार ने बेशर्मी से घुटने टेक दिए हैं। जो भी नाजायज मांग इनकी तरफ से पेश की जाती है, उसे बिना राष्ट्रहित का सोच-विचार किये दनादन कोलंबो को पठा दिया जाता है। अब तक यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है कि लिट्ट को निर्णायक हार के कगार तक पहुंचा चुकी श्रीलंका की सरकार भारत सरकार की कोई भी उस सिफारिश पर सहानुभूति से विचार करन को तैयार नहीं जिसमें तमिलों के प्रति हमदर्दी या संयम बरतने की बात सुझाई जाती है। भले ही आज हम हिन्दुस्तान में यह बात भुलान की नादानी कर रहे हैं कि प्रभाकरण राजीव गांधी की बर्बर हत्या की साजिश में शामिल रहा है। श्रीलंका वाल कैसे उस खून-खराबे को माफ कर सकते है, जो दुनिया में सबसे खतरनाक और क्रूर समझे जाने वाले दहशतगर्द आतंकवादी संगठन ने उन पर थोपा है? बांग्लादेश की बात करत-करते श्रीलंका तक पहुंच जाना विषयांतर नहीं समझा जाना चाहिए। हमारा मकसद इस बात को रेखांकित करना है कि पड़ोस में हमारे लिए घातक घटनाक्रम के बारे में लापरवाही या असंतुलित रवैया कितना नुकसानदेह हो सकते हैं। हमारा यानी अधिकांश समय पाकिस्तान पर ही लगा रहता है और वह भी बहुत अदूरदर्शी तरीके से। मसलन मुम्बई पर आतंकवादी हमल के बाद से हम अपना सारा श्रम इसी लक्ष्य के प्राप्ति के लिए खर्च करते रहे हैं कि अमेरिका किसी तरह पाकिस्तान से यह कबूल करवा ले कि इस घटना की साजिश पाकिस्तान में ही रची गई थी और उसी के नागरिक इसके लिए जिम्मेदार हैं। यह सोचन की फुरसत किसी को नहीं कि जिस वक्त पाकिस्तान ने जान-बूझकर हमें इस बेमतलब बहस में उलझा रखा है, उसी वक्त वह हमें घायल करन के लिए पड़ोस में ही क्या कुछ और कर रहा है। बांग्लादेश की बगावत की पड़ताल करते वक्त इस आयाम को अनदेखा नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के प्रचार-प्रसार का जरिया भी सऊदी अरब और लीबिया जैसे देशों ने पाकिस्तान को बना रखा है। बांग्लादेश में आज भी पाकिस्तानियों के लिए भारत विरोधी स्वर मुखर करना इस्लामी भाईचारे के नाम पर किसी दूसरे देश के खुफिया एजेंट की तुलना में कहीं अधिक आसान है। पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, नेपाल हो या श्रीलंका, इनके साथ भले हमारा खून का रिश्ता है, आज इस बात को निरन्तर याद रखन की जरूरत है कि राष्ट्र-राज्य के रूप में हरेक की एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अलग पहचान है और प्रत्येक के राष्ट्रहित समान नहीं, खासकर जब से अन्तरराष्ट्रीय परिवेश में इस्लामी-अरब-पेट्रोडॉलर सम्पन्न बिरादरी ने अपना अलग कट्टरपंथी खेमा गाड़ा है, तब से धर्मनिरपेक्ष भारत से पाकिस्तान और बांग्लादेश की भावनात्मक दूरी बढ़ी है। जहां तक श्रीलंका का प्रश्न है, वहां की सरकार के लिए लिट्टे वाले तमिलों के संरक्षक भले ही तमिलनाडुवासी भारतीयों के सहोदर क्यों न हों, उनकी आंतरिक राजनीति के संदर्भ में उस देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा जोखिम ही बने रहेंगे। सबसे बड़ी जरूरत साझा सरकार के दौर में संकीर्ण मानसिकता वाले क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के हाथों कठपुतली बनने से बचन की है। करोड़ों की संख्या में जो बांग्लादेशी अवैध रूप से भारत में घुसपैठ कर पहुंचे हैं और हमारे लिए जोखिम भरी पेचीदा चुनौती पेश कर रहे हैं। उसके लिए माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की सरकारें ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अपना वोट बैंक बढ़ान के लिए इसे होने दिया। बांग्लादेश में बगावत का दमन भले ही सम्पन्न हो चुका है, संकट अभी भी बरकरार है। आने वाले महीनों में चुनावी सरगर्मियां हमारे देशवासियों को उलझाए रखेंगी और पड़ोस में बिगड़ते माहौल के प्रति सतर्कता और भी खतरनाक ढंग स कम होती जायेगी। श्चह्वह्यद्धश्चद्गह्यद्धश्चड्डठ्ठह्लञ्चद्दद्वड्डन्द्य.ष्oद्वड्ढr लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं

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  • Web Title: बांग्लादेश में बगावत की हकीकत