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ब्लॉग वार्ता : अब भी एक शहर है नैनीताल

ौन जाता है अब पहाड़ों पर हवा बदलने के लिए। अब तो ढलान से उतरने लगे हैं लोग रोजगार के लिए। इक्कीसवीं सदी के इस हिस्से में हमारे पुराने शहर बेजरूरी लगने लगे हैं। नैनीताल और मसूरी में खिंचाई गईं न जाने कितनी तस्वीरें आज भी एल्बम से निकल आएं, मगर अपनी जवानी को वहां की वादियों में खूबसूरत याद देकर लौटने वाले सैलानियों का वो तबका कहां रहा। एक ब्लॉगर ऐसी है जो नैनीताल को पहुंचा रही है घर-घर में। यशस्वी ब्लॉग पर जाने के लिए क्िलक कीजिए- ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्4ड्डह्यद्धह्य2न्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व।द्धह्लह्लश्चज्4ड्डह्यद्धह्य2न्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व। आपको किस्सा मिलेगा नैनीताल की पब्लिक लाइब्रेरी का। 1में स्व. मोहन लाल साहजी को लगा था कि नैनीताल के पास लाइब्रेरी नहीं है। अपनी जेब से पांच हजार रुपये देकर नैनीताल को पहली लाइब्रेरी दे दी। दुर्गा शाह म्युनिसिपल लाइब्रेरी की इस कहानी पर ब्लॉगरों के कमेंट टूट पड़े हैं। पचपन साल बाद कोई ब्लॉगर मोहन लाल साह को नमन करे तो समझिये कि ब्लॉग सार्थक हो रहा है। इस ब्लॉग पर पूरा नैनीताल मिलेगा। यहां की पुरानी इमारतों में सेंट जोन्स चर्च का जिक्र है। मल्लीताल में है सेंट जोन्स चर्च। 1848 में बन कर यह इमारत तैयार हो गई थी। 18ी नैनीताल की एक पुरानी तस्वीर है। नई तस्वीरें भी हैं। आसानी से फर्क पता चल जाता है। इन पहाड़ों पर जाना बंद करने से पहले हमने इनका क्या हाल कर दिया है। एक कविता भी पड़ी हुई मिली। डेविस लेबटोर्व की। चंद्र प्रभा पांडेय ने अनुवाद किया है। अगर रथ और पैरों में चुनाव करना हो तो मैं पैरों को चुनूंगी। मैं उन रास्तों पर चलना चाहती हूं, जहां पहिये नहीं जा सकते। ये कविता हमारे भीतर के सैलानी को बता रही है कि घूमन के लिए गेस्ट हाउस की बुकिंग, शॉपिंग लिस्ट जरूरी नहीं। देखने की तमन्ना होनी चाहिए। विनीता यशस्वी अल्मोड़ा यात्रा पर भी निकल पड़ती हैं। लोहे के शेर की कहानी बूझने की कोशिश करती हैं। शहर में एक शेर है जो लोहे का बना है। किसने बनाया, क्यों बनाया, पता नहीं। विनीता अल्मोड़ा की गलियों में घूमने लगती हैं। मुरली मनोहर मंदिर होते हुए मल्ला महल पहुंचती हैं। घूमते हुए पहुंचती हैं पर्दा नौला। पानी का कुंड। पुराने जमाने में महारानियों के नहाने के लिए नौला का निर्माण कराया गया था। शहर को देखन का यह तरीका पसंद आया। आमतौर पर हम गाइड के बताये हुए दो- चार मशहूर जगहों को देख कर ही लौट आते हैं। विनीता के लिए घूमने का मतलब है अल्मोड़ा के मंदिर मोहल्लों को भी देखना। बस से घूमने वाली विनीता खांटी पर्यटक हैं। उनके पर्यटन में सौंदर्य भी है, भक्ति भी है और जिज्ञासा भी। वो नैनीताल से देवीधुरा निकलती हैं तो बता रही हैं कि मां ने घंटी खरीदी थी। नौ-दस साल से घर में पड़ी हुई थी। आज मौका मिला है तो निकल पड़ी हूं। नैनीताल के मल्लीताल मस्जिद की खूबसूरत तस्वीर है। पहले से चले आ रहे नन्दा देवी मेले का खूबसूरत जिक्र है। सितम्बर के महीने में लगता है मेला। पूरे शहर में नन्दा-सुनन्दा के डोले को घुमाया जाता है। विनीता चाहें तो इस ब्लॉग को और समृद्ध कर सकती हैं। नैनीताल के और भी किस्सों का इंतजार है। विनीता नैनीताल के इतिहास में डूबी हैं। बताती हैं कि कभी नैनीताल और उसके आसपास 60 से अधिक झीलें हुआ करती थीं। 50 से अधिक झीलें गायब हो चुकी हैं। नैनीताल, भीमताल, सतताल संकट में हैं। आज कोई नैनीताल के लिए रोने वाला नहीं। काठगोदाम एक्सप्रेस से आने वाले सैलानी इन दिनों इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर नजर आते हैं। वो क्वालालम्पुर में बने फ्लाईओवर और शॉपिंग मॉल देखने जा रहे होते हैं। विनीता कहती हैं कि हमारे आसपास प्रकृति ने ज्ञान और सौंदर्य का अद्भुत खजाना फैलाया हुआ है। इस ब्लॉग में इसी खजाने से कुछ न कुछ जब-तब आपके साथ बांटने का प्रयास किया जाएगा। विनीता कई किस्म की जड़ी-बूटियों का जिक्र करती हैं। डैन्डीलियन, मंजीठा, रतपतिया और ममीरा। ये सब घास हैं, मगर इनके कई काम हैं। सवाल इन-सब जड़ी बूटियों से बीमारी को ठीक कर देने के दावे का नहीं है। सवाल है कि क्या अब हम इन सब चीजों के बारे में जानते हैं। हर हरी चीज को घास कह देते हैं। अब तो बताने वाले लोग भी नहीं रहे। इंटरनेट ही अब हमारे लिए दादी-नानी है। सर्च कीजिए, कुछ न कुछ जवाब मिलेगा। ब्लॉगर की ही कोशिश है कि कोई दुर्गा शाह म्यूनिसिपिल लाइब्रेरी का जिक्र सुनकर खुश हो जाता है। इस बार की गर्मियों में नैनीताल जाइयेगा। rड्ड1न्ह्यद्धञ्चठ्ठस्र्ह्ल1.ष्oद्वड्ढr लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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