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आम चुनाव के उलझे आसार

ठीक आम चुनाव की घोषणा के वक्त पश्चिम बंगाल के बिष्णुपुर में तृणमूल कांग्रेस की जीत चौंकाने वाली है। 1े बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे के गढ़ पर खतरा दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण है, ग्रामीण इलाकों में जमीन का सवाल। इसके अलावा अल्पसंख्यक भी खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। राज्य में एक-चौथाई मतदाता अल्पसंख्यक हैं। दूसरी तरफ भदोई में समाजवादी पार्टी की जीत मायावती के लिए एक बड़ा झटका है। यह ठीक है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके के एक नतीजे से पूरे प्रदेश के मूड को नहीं भांपा जा सकता। लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने जो जीत हासिल की थी, उसे बनाए रखना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती होगा। उस प्रदर्शन के हिसाब से तो पार्टी को 54 लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लेना चाहिए, लेकिन अगर पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा तबका मुलायम सिंह यादव के साथ बना रहता है तो वे ज्यादा ताकतवर बनकर उभरेंगे। उपचुनाव के ये दोनों नतीजे उस समय आए हैं जब राजनीति के तीनों बड़े मोर्चे डावांडोल हालत में हैं। नतीजों के तुरंत बाद ही कांग्रेस ने मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी से अपने गठाोड़ को सिर चढ़ा लिया। इन तीनों दलों के पास पिछली लोकसभा में 122 सीटें थीं। इस गठाोड़ का भूगोल गाजियाबाद से लेकर गंगा-ामुना के मैदान और डायमंड हार्बर तक जाता है। लेकिन गठाोड़ यह भी बताता है कि कांग्रेस कितनी बुरी तरह दूसरों पर निर्भर है। पिछली बार इसकी 145 में 62 सीटें क्षेत्रीय सहयोगी दलों की कृपा से मिली थीं। इतिहास में यह पहला मौका है जब इसने लखनऊ और कोलकाता में पहली बार किसी को अपने से ऊंचा स्थान दिया है। यह एक तरह से सच को पहचानना भी है और यह स्वीकारना भी कि पिछले पांच साल में इसे जिस तरह का विस्तार करना चाहिए था, वह हो न सका। लाल कृष्ण आडवाणी की पार्टी भी पीछे नहीं है। अजित सिंह एक छोटी-सी ताकत हो सकते हैं जिनका दायरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है, लेकिन उनके साथ से उत्तर प्रदेश की जंग में भाजपा को थोड़ी-सी राहत जरूर मिलेगी। हरियाणा में चौटाला और पूवरेत्तर में असम गण परिषद भी उनके साथ है। भाजपा की समस्या कांग्रेस की उल्टी है। पूर के पूर दक्षिण भारत में इसका कोई सहयोगी नहीं है। पिछली बार दक्षिण के क्षत्रप उसके साथ थे और तमिलनाडु में तो वह सहयोगी बदलने तक की स्थिति में थी। दिक्कत यह भी है कि वाजपेयी चुनाव प्रचार के लिए उपलब्ध नहीं हैं और आडवाणी में वैसी अपील नहीं है। उत्तर प्रदेश में पार्टी की हालत खस्ता है। वाजपेयी की पहली जीत में यहां पार्टी का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था और दूसरी में मध्यम। यहां एकाुट हिन्दू वोट अब पार्टी को नहीं मिलने वाले। चर्चा के केंद्र में तीसरा मोर्चा भी है। इसका सारा दारोमदार दक्षिणी राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियों पर है। आने वाले समय में इसमें चंद्रबाबू नायडू, देवेगौड़ा और जयललिता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इतना ही महत्वपूर्ण बिहार में सभी वामपंथी दलों का गठाोड़ है। 1े बाद पहली बार वहां भाकपा, माकपा और नक्सलवादी पार्टियां एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। तीसरा मोर्चा इस उम्मीद पर कायम है कि लोकसभा त्रिशंकु होगी। लेकिन इसके बावजूद अक्सर तीसर मोर्चे का मौका नहीं आता। 1े लोकसभा चुनाव में इस मोर्चे का परचम मुलायम सिंह यादव के पास था। इसके पहले के चुनाव में इसके मोर्चे पर लालू यादव डटे थे। करुणानिधि के साथ ही मंडल की ये दोनों ताकतें अब कांग्रेस के साथ हैं। एक दावा बहुान समाज पार्टी की तरफ से भी है। हालांकि दावेदारी के बावजूद वह चौथे नंबर से भी थोड़ी दूरी पर ही है। प्रोफेसर ए.के. वर्मा ने हाल ही में एक शोध से यह नतीजा निकाला है कि बसपा उत्तर प्रदेश के बाहर 200 सीटों पर असर डाल सकती है, लेकिन इस मौजूदगी को अभी वह जीत में बदलने की स्थिति में नहीं आई है। फिलहाल वह अपने उत्तर प्रदेश से ही उम्मीद बांध रही है, इसके अलावा अगर कहीं सीट आ गई तो वह बोनस होगा। लेकिन जिस तरह का इसका कॉडर है और जिस तरह की इसकी अखिल भारतीय मौजूदगी है, उसके चलते इसमें भविष्य के लिए काफी संभावनाएं हैं। अगर मायावती को इस चुनाव में तीस से चालीस सीटें भी मिल जाती हैं, तो वह सौदेबाजी की काफी अच्छी स्थिति में होंगी। कहना मुश्किल है कि वे अभी दावेदार होंगी या पार्टी का आधार बढ़ने तक इंतजार करना पसंद करंगी। उनके सामने दो विकल्प हैं। 1े देवगौड़ा की तरह मौका मिले तो फायदा उठा लें, लेकिन देवगौड़ा की सरकार ज्यादा चल नहीं सकी थी। या फिर चंद्रबाबू नायडू की तरह सही मौके का इंतजार करने में ही भलाई समझें। उनकी पार्टी का तर्क है कि अगर वे प्रधानमंत्री बन गईं तो सार समीकरण बदल जाएंगे। फिलहाल कोई भी भविष्यवाणी मुश्किल है। ज्यादा संभावना यही है कि ऐसा गठाोड़ आएगा जिसकी बागडोर एक या दो बड़े दलों के पास होगी, लेकिन किसी भी सूरत में छोटे दल महत्वपूर्ण होंगे। यही हुआ भी है। 1से 2004 तक रक्षा मंत्रालय एक क्षेत्रीय दल के पास रहा है। अभी भी टेलीकॉम, रेलवे और परिवहन जसे महत्वपूर्ण मंत्रालय क्षेत्रीय दलों के पास ही हैं। राजनीति बदल रही है। मंदी और उसकी वजह से फैल रही बेरोगारी मतदाता के लिए बड़ा मुद्दा हो सकती है। वह ऐसे गठाोड़ को खोजने की कोशिश कर सकता है जो अर्थव्यवस्था के संकट और क्षेत्रीय सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दे। अर्थव्यवस्था का यह संकट पूरे पांच साल तक विकास दर आठ से नौ फीसदी तक रहने के बाद आया है। बाजार में मांग कम है, निर्माण कार्य रुके हुए हैं, कृषि और सेवा क्षेत्र से आने वाली खबरं अच्छी नहीं हैं। सबसे ज्यादा असर निर्यात इकाइयों पर पड़ा है। लोग इस हालात के लिए किस पर आरोप लगाएंगे? कौन है जो अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए मतदाताओं को सबसे बेहतर लग सकता है? हमने पिछले एक दशक में ऐसे दो गठाोड़ देखे हैं, जिनकी बागडोर एक बड़ी पार्टी के हाथ में थी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सिलसिला आगे भी चलेगा या फिर कोई तीसरा मोर्चा सामने आएगा। इस बड़े फैसले का महापर्व शुरू हो चुका है। rड्डठ्ठद्दrड्डद्भड्डठ्ठ.द्वड्डद्धद्गह्यद्ध ञ्चद्दद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखक राजनीतिक विश्लेषक और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं।

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