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सिपाहियों की बर्खास्तगी का आदेश बड़ी पीठ से भी रद

हाईकोर्ट ने बुधवार को लगभग 23 हाार सिपाहियों की बर्खास्तगी का राज्य सरकार का आदेश रद कर दिया। कोर्ट ने जाँच प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहा है कि बिना सही और गलत की जाँच किए बगैर सभी को बर्खास्त कर दिया गया। इस प्रकार की बर्खास्तगी का आदेश अवैध है। इतना ही नहीं, कोर्ट ने कहा कि चयन नियुक्ति को रद करने से पहले सिपाहियों का पक्ष भी नहीं सुना गया, यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त के खिलाफ है। हालाँकि कोर्ट ने राज्य सरकार को छूट दी है कि वह सही-गलत की जाँच कर फिर से आदेश पारित कर सकती है। कोर्ट ने दोषी अधिकारियों के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई को धीमा एवं असंतोषजनक बताते हुए उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करने को भी कहा है।ड्ढr यह निर्णय न्यायमूर्ति जनार्दन सहाय एवं न्यायमूर्ति राकेश शर्मा की खण्डपीठ ने एकलपीठ के विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा दाखिल विशेष अपील खारिा करते हुए खुली अदालत में सुनाया। यूपी में वर्ष 2006 में लगभग 23 हाार सिपाहियों का चयन एवं नियुक्ति की गई थी। इस चयन प्रक्रिया में तमाम अनियमितताएँ बरते जाने के आरोप लगे थे। प्रदेश सरकार ने वरिष्ठ आईपीएस शैलजा कान्त मिश्र के नेतृत्व में एक जाँच समिति गठित की थी। उसके निष्कर्ष के आधार पर यूपी सरकार ने इन सिपाहियों को बर्खास्त कर दिया था।ड्ढr राज्य सरकार ने 11 सितम्बर 07, 18 सितम्बर 07 एवं 30 सितम्बर 07 को आदेश पारित किए थे। इसे बर्खास्त सिपाहियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जज डीपी सिंह ने इन सिपाहियों की बर्खास्तगी के आदेश को रद कर दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को दो न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष विशेष अपील में चुनौती दी थी जिसे कोर्ट ने खारिा कर दिया। फैसले के अध्ययन के बादड्ढr रुख तय करेगी सरकारड्ढr लखनऊ। पुलिस भर्ती मामले में हाईकोर्ट के फैसले के बारे में राज्य सरकार अपना रुख फैसले की कॉपी मिलने के बाद तय करेगी। राज्य के गृह सचिव कुमार कमलेश ने बताया कि अगर जरूरत पड़ी तो सरकार इस मामले में एसएलपी दाखिल कर सकती हैं। (विसं)ड्ढr

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