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वोटर युवा तो प्रत्याशी बूढ़े क्यों!

वोटर युवा तो फिर कैंडिडेट ओल्ड क्यों? लोकसभा चुनाव में सीटों की गणित में उलझी राजनीतिक पार्टियों के लिए यह नई टेंशन हो सकती है। खासकर तबजब बिहार जैसे राजनीतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में युवा वोटरों की ताकत बढ़ गयी हो। बिहार में परंपरागत वोटर या फिर यूं कहें कि अधेड़ या बुजुर्गियत की दहलीज पर कदम रख रहे वोटरों का संख्या बल उतना कारगर नहीं रहा जिनके बूते संसद में परचम लहरा दिया जाए। युवा वोटरों की तादाद ही बिहार का राजनीतिक भविष्य तय करगी यह बात अब राजनीतिक दलों के पल्ले भी पड़ने लगी है।ड्ढr ड्ढr भाजपा ने तो इसे ताड़ भी लिया है। प्रदेश के हर जिले में भाजपा ‘नव मतदाता सम्मान सम्मेलन’ भी आयोजित कर रहा है। इसके पीछे की वजह सिर्फ यही है कि बिहार में 18 से 30 साल तक के वोटरों की तदाद 25 फीसदी से अधिक है। इस आंकड़े से यह यह तस्वीर साफ हो चुकी है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में युवा वोटरों की ताकत निर्णायक साबित होगी।ड्ढr ड्ढr राजनीतिक दलों के बूथ लेबल एजेंटों के जरिए संबंधित क्षेत्रों के युवाओं में वोटिंग के लिए जागरूकता पैदा करने की मुहिम चलाने को कहा गया है। पार्टियों ने अगर वोटरों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनायी तो संभव है बिहार से अधिक युवा चेहरों के संसद पहुंचने की संभावना बढ़ जाएगी।

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