DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सबको चाहिए मुसलमानों के वोट

लोकसभा चुनाव के लिए सभी दल अपना तीर-कमान कसने में जुट गए हैं। आज सभी दलों के लिए एक-एक वोट कीमती हो गया है। खासकर मुसलमानों का वोट तो सबके लिए महत्वपूर्ण हो चुका है। तीन दलों राजद, जदयू और लोजपा की तो इस पर पैनी निगाहें हैं। भाजपा में मुसलमान वोट को लेकर ज्यादा आग्रह नहीं है, लेकिन मुसलमान बहुल लोकसभा क्षेत्रों में मुसलमान प्रत्याशी को टिकट देने में उसे बहुत परहेज भी नहीं है। पर एक सच यह भी है कि सत्ताधारी पार्टियां मुसलमानों को आबादी के अनुसार भी टिकट नहीं देतीं।ड्ढr ड्ढr प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 16 फीसदी है। राज्य के कुछ जिलों में मुसलमानों की आबादी 40 से 60 प्रतिशत तक है। मुसलमान वोटर अकेले हार-जीत तय करने की स्थिति में दो या तीन संसदीय क्षेत्रों में ही हैं, लेकिन दूसरों के साथ मिलकर चुनाव की तस्वीर बदल देने में सक्षम हैं। मुसलमानों में अशराफ और पसमांदा का भेद होने के बाद भी उनकी वोटिंग लगभग एक तरफा होती रही है। जनता दल में एक के बाद एक फूट के बावजूद मुसलमान और यादव वोटों की संयुक्त ताकत से ही लालू प्रसाद यादव 15 वर्षो तक बिहार पर एकछत्र राज करते रहे। 1ा भागलपुर का दंगा हो या आडवाणी की रथ यात्रा या मंडल आंदोलन, बिहार की राजनीतिक परिस्थिति कुछ ऐसी रही कि मुसलमान यादव के साथ मिल गए। इसके बाद माय का समीकरण बना और बिहार में लालू प्रसाद यादव कांग्रेस को छोड़कर सभी दलों के लिए एक चुनौती बन गए।ड्ढr ड्ढr बिहार में पिछले दस वर्षो के दौरान पिछड़े मुसलमानों के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। गुलाम सरवर और तकी रहीम की पीढ़ी के बाद डा. एजाज अली और पत्रकार अली अनवर ने पिछड़े और दलित मुसलमानों की आवाज को बुलंदी दी। भाजपा ने भी सैयद शाहनवाज हुसैन को आगे किया। लेकिन बहुसंख्यक पसमांदा की राजनीतिक ताकत एजाज अली और अली अनवर के आसपास ही केंद्रित रही। ये दोनों पहले लालू यादव के साथ ही थे, जो बाद में नीतीश कुमार के पाले में चले गए। यह याद रखा जाना चाहिए कि जब लालू प्रसाद मुसलमानों के नाम पर अगड़े मुसलमानों को राज्यसभा में भेज रहे थे, उस समय नीतीश कुमार ने पिछड़े और दलित मुसलमानों के प्रतिनिधियों को भेज दिया। 2005 के विधानसभा चुनाव में इसका असर भी दिखाई पड़ा।ड्ढr ड्ढr मुसलमानों का एक बड़ा तबका लालू यादव से बिदक कर नीतीश कुमार के खेमे में चला गया, जिसे भाजपा से भी कोई परहेज नहीं रहा। लोजपा ने बड़ी संख्या में मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट दिया, जो जीतने में सक्षम भले नहीं रहें इतना वोट काटने में सक्षम थे कि राजद की हार हो जाए। रामविलास पासवान चाहते थे भी यही थे। परिणाम सामने है। हालांकि, यह भी सच है कि मुसलमानों की तीन जातियों का ही राजनीति पर आधिपत्य रहा है। बिहार से अब तक कुल 51 मुसलमान उम्मीदवार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं जिनमें से अधिसंख्य शेख, सैयद और पठान ही रहे। 14 लोकसभा चुनावों में मात्र 14 पसमांदा मुसलमान ही विजयी रहे हैं। राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो अब तक विधान सभा के लिए करीब 255 मुसलमान निर्वाचित हुए हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या करीब 145 शेखों की रही है, जबकि दूसरे स्थान पर सैयद रहे हैं, जिनकी संख्या 40 के करीब रही है। इसबार लोकसभा चुनाव बिहार में लालू-रामविलास बनाम नीतीश कुमार के बीच ही होने की पूरी संभावना है। वैसे में मुसलमानों के वोटों का जोड़-भाग शुरू हो गया है। भाजपा सैयद शाहनवाज हुसैन के साथ पत्रकार व पूर्व कांग्रेसी सांसद एमजे अकबर पर भी नजर गड़ाये हुए है। श्री अकबर किशनगंज से एक बार कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हो चुके हैं। अब भाजपा उन्हें किशनगंज से ही आजमाना चाहती है। कुल मिलाकर अतिपिछड़ों और महादलित पर निशाना साध चुके नीतीश के निशाने पर अब मुसलमान ही हैं। दिलचस्प यह देखना होगा कि मुसलमानों का वोट नीतीश की झोली में जाता है या लालू की झोली में?ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: सबको चाहिए मुसलमानों के वोट