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अवस्थीजी पंचतत्व में विलीन

अवस्थीजी पंचतत्व में विलीन

प्रसिद्ध संपादक और साहित्यकार राजेन्द्र अवस्थी का बुधवार को राजधानी में निधन हो गया और उनका गुरुवार को लोदी रोड के शवदाह गृह में अंतिम संस्कार किया गया।

जबलपुर के गढ़ा में 25 जनवरी 1930 को जन्मे अवस्थी ने नवभारत, सारिका, नंदन, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के संपादक के तौर पर कार्य किया था।

सूरज किरण की छांव, जंगल के फूल, जाने कितनी आंखे, बीमार शहर, अकेली आवाज और मछलीबाजार उनके उपन्यास हैं। उनके कहानी संग्रह मकड़ी के जाले और दो जोड़ी आंखे तथा उतरते ज्वार की सीपियां, एक औरत से इंटरव्यू और दोस्तों की दुनिया उनके कविता संग्रह हैं, जबकि जंगल से शहर तक उनका लिखा यात्रा वृत्तांत है।

ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने कहा कि राजेन्द्र जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और लेखन में उन्हें लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

उन्होंने कहा कि उन्हें तंत्रमंत्र में काफी रूचि थी और कादम्बिनी के कई अंकों में उन्होंने तंत्रमंत्र पर आधारित सामग्री का प्रकाशन किया था, जिसकी आज भी पाठकों के दिलोदिमाग पर अमिट छाप है।

साहित्यकार अशोक चक्रधर ने राजेंद्र अवस्थी के निधन पर गहरा शोक जताते हुए कहा कि कादम्बिनी के संपादक के रूप में उन्होंने पाठकों के बीच अपनी गहरी पैठ बनाई।

हिन्दी और डोगरी की साहित्यकार पद्मा सचदेव ने कहा कि यह समाचार सुनकर वह सकते में आ गईं। राजेन्द्र जी जिंदगी को पूरी जीवंतता के साथ जीने वाले व्यक्ति थे और जिस पत्रिका का संपादन करते थे उसको आत्मसात कर लेते थे।

उन्होंने कहा कि एक दफा उन्होंने उनसे कहा कि कादम्बिनी में डोगरी का कुछ क्यों नहीं छापते हैं, तो उन्होंने तपाक से कहा कि आपने कुछ दिया ही नहीं हम छापते कैसे।

उन्होंने कहा कि हम सभी ऐसी उम्र में आ गए हैं, जब सभी एक-एक करके जा रहे हैं। जब भी कोई इस दुनिया को छोड़कर जाता है तो लगता है एक तारा टूट गया।

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