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हम मिलकर बना सकते हैं विकसित भारत

हमारे 2010 में प्रवेश के साथ यह भी लगने लगा है कि विजन 2020 में आर्थिक रूप से विकसित और सामाजिक रूप से भागीदारी वाले जिस भारत की कल्पना हमने की थी उसे प्राप्त करने का अब यह आखिरी दशक बचा है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई मिशन शुरू किए गए हैं। हाल में आए आर्थिक संकट के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था में सात प्रतिशत की विकास दर बने रहने और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले हमारे ज्यादा स्थिर बने से यह साबित होता है कि हमारी आर्थिक प्रणाली का आधार ज्यादा लचीला है। वास्तव में अनुमान है कि यह विकास दर अगले साल तक आठ प्रतिशत हो जाएगी जिससे आगे चल कर हम विजन 2020 के लक्ष्यों को पाने के लिए इसे दस प्रतिशत विकास दर की पटरी पर डाल सकेंगे। पिछले दशक में विकास की राजनीति पर जोर बढ़ा है और हम देख रहे हैं कि चुनावों में स्थानीय विकास लगातार मुद्दा बन रहा है और उनके आधार पर परिणाम तय हो रहे हैं। यह आखिरी दशक हमसे यह उम्मीद करता है कि हम मौजूदा मिशन पर चलते रहेंगे और 2020 तक एक विकसित भारत बनाने के अपने उद्यम को भी नया रूप देंगे।
सबसे पहले तो हमें अपने कृषि क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार करना होगा क्योंकि  उस पर दो तिहाई ग्रामीण आबादी निर्भर है। जमीन का रकबा और पानी सीमित होने के कारण हमें दूसरी हरित क्रांति के माध्यम से अपनी खेती की उपज दोगुनी करनी होगी। हमें यह भी देखना होगा कि किस प्रकार कृषि वैज्ञानिकों के शोध को किसानों तक लाया जाए। वैज्ञानिकों की उत्कृष्टता, स्थानीय विवेक और किसानों की व्यावहारिकता एक महान युति बन सकती है। इस दौरान बैंकिंग उद्योग को किसानों विशेषकर छोटी जोत वाले और मजदूरों की मदद के लिए पंचायतों के सहयोग से नए तरीके अपनाने होंगे। इसमें आईटी उद्योग के नए उत्पाद जैसे मोबाइल बैंकिंग का उपयोग शामिल है।

एकीकृत ग्रामीण विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए देश के छह लाख गांवों तक पहुंचने वाले सात हजार पूरा (शहरी सुविधाओं को गांवों में ले जाने की योजना) परिसर कायम करने होंगे। इसके लिए तीन स्तरीय संपर्क की जरूरत होगी। उनमें भौतिक, इलेक्ट्रानिक और ज्ञान संबंधी संपर्क शामिल हैं। इससे पूरा परिसरों में आर्थिक संपर्क कायम होगा। यह प्रौद्योगिकी , शोध, प्रबंधन और उद्यमशीलता का संगम होगा जो कि राष्ट्रीय विकास के लिए मिल कर काम करेगा। इसका जोर रोजगार सृजन पर होगा। यह मिशन निजी, सार्वजनिक और सामुदायिक साङोदारी के सहकारिता पर आधारित होगा। इस तरह के राष्ट्रीय पूरा मिशन से न सिर्फ ग्रामीण स्तर पर प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी बल्कि सकल मानवीय विकास सूचकांक को बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे 70 करोड़ ग्रामीणों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सफाई की सुविधा हासिल होगी और हमारा देश गांव और शहर की खाई को पाट सकेगा। हमारा अगला मिशन पूरे देश को शुद्ध पानी और बिजली देने और पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने का होगा। इसके लिए भारत को एक स्वतंत्र ऊर्जा नीति विकसित करनी होगी और उसे लागू करना होगा। इसका जोर गैर पारंपरिक और नवीकरण वाले ऊर्जा स्नोतों पर ध्यान केंद्रित करने पर होगा। इसमें सौर, हवा, जलविद्युत, जैव-ईंधन और नाभिकीय विद्युत जैसे स्नोत शामिल हैं। इससे न सिर्फ हमारी ऊर्जा आवश्यकता पूरी होगी बल्कि जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से निकले वाली ग्रीन हाउस गैसों का उत्सजर्न भी कम होगा। इसी तरह हमारे खेतों में पर्याप्त पानी लाने के लिए सिंचाई के तंत्र को भी सुधारना होगा। यह काम वर्षा के पानी को सहेजने से , नदियों  और देश की जलधाराओं को जोड़ने से किया जा सकता है। इसे पहले राज्य स्तर पर फिर राष्ट्रीय स्तर वाटर ग्रिड बनाकर करना होगा। इसी तरह पानी के आपूर्ति पक्ष का भी बेहतर प्रबंधन करना होगा। उसके लिए आधुनिक सिंचाई जैसे कि ड्रिप की सिंचाई को बढ़ावा देना होगा।

सन 2020 तक एक विकसित देश का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को क्रांतिकारी रूप देना होगा। इसके लिए हमें मूल्य आधारित शिक्षा को अपनी प्राथमिक शिक्षा से जोड़ना होगा। इसमें ज्ञान पाने पर ही नहीं बल्कि सृजनात्मकता और मूल्य व्यवस्था हासिल करने पर जोर दिया जाएगा। 21वीं सदी के भारत के लिए सभी मोर्चो पर नेतृत्व की जरूरत होगी । वह ऐसा नेतृत्व होगा जो विश्वसनीयता के साथ काम करेगा और उसी से सफलता भी प्राप्त करेगा।

हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली को इसलिए काम करना चाहिए कि वह किस प्रकार प्रौद्योगिकी और अंतरविभागीय ज्ञान के संयोजन से जमीनी स्तर पर क्रांतिकारी बदलाव ला सकेगी। देश की शिक्षा प्रणाली को भारत के युवाओं में एक प्रकार का उत्साह और आत्मविश्वास भरना होगा। वह विश्वास होगा कि -‘मैं कर सकता हूं, हम सब कर सकते हैं और भारत कर सकता है।’ इसके अलावा हमारी शिक्षा प्रणाली को भारत को एक ज्ञान आधारित समाज बनाने की दिशा में केंद्रित करना होगा। इससे इस बात की गारंटी होगी कि हर भारतीय के भीतर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की एक कुशलता होगी। या उसके पास ऐसी उच्च शिक्षा होगी जिससे वह शोध कर सके, विकास कर सके, उत्पादन कर सके, मूल्य संवर्धन करेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादों और सेवाओं की मार्केटिंग कर सके। लेकिन एक विकसित देश की शक्ल तब तक नहीं बनती जब तक इसमें नागरिकों को अच्छी सेहत प्रदान करने का लक्ष्य शामिल न किया जाए। इस लक्ष्य में पोषण, टीकाकरण, सफाई, रोकथाम और जागरूकता और उनमें सबसे ऊपर किसी तरह की बीमारी से लड़ने की क्षमता शामिल है। आजीवन स्वास्थ्य देखभाल करने के इस मिशन को तैयार करना होगा और इसे सभी नागरिकों के लिए देश में उपलब्ध विविध पारंपरिक और आधुनिक औषधि प्रणालियों के मिले-जुले रूप के माध्यम से लागू करना होगा। एक समृद्ध और खुशहाल भारत होने के लिए एक खुशहाल भारत पहली शर्त है। जब भारत विकसित राष्ट्र बन जाएगा तो उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ज्यादा जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी और हमें यह सोचना होगा कि किस तरह से हमारे काम विश्व समुदाय और हमारे पड़ोसियों को प्रभावित करेंगे। एक शांतिपूर्ण देश तब तक नहीं बन सकता जब तक शांतिपूर्ण पड़ोस न कायम हो। इस मकसद के लिए व्यापारिक संबंधों में सुधार करना होगा, देशों का समांतर विकास करना होगा और लंबे समय से उलङो मुद्दों को मिलकर सुलझाना होगा। इसी से हम एक हरे-भरे, साफ सुथरे और प्रदूषण मुक्त देश का विकास कर सकेंगे। वहां बिना गरीबी के समृद्धि होगी, बिना युद्ध के शांति होगी और वह देश के सभी नागरिकों के रहने के लिए एक खुशहाल जगह होगी। 

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