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आंध्र प्रदेश: राजनीतिक ब्लैकमेल के फायदे

यह अलग बात है कि तेलंगाना के लिए चल रही मुहिम से आंध्र प्रदेश के इस पिछड़े इलाके को राज्य का दर्जा मिलता है या नहीं, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं से राष्ट्रीय जनमानस पर गहरा असर हुआ है। पहले स्तर पर गृहमंत्री पी. चिदंबरम की आधी रात की घोषणा से अलग राज्य की कई मांगें सारे देश से उठने लगी हैं। दूसरे स्तर पर इसने भूख हड़ताल के हथियार को सस्ता बना दिया है। जिस हथियार को महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता के लिए अहिंसक संग्राम में इतने प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल किया था वही हथियार यहां ब्लैक मेल जैसा बनता दिखाई दिया। ऐसा इसलिए कि केन्द्र सरकार की घोषणा टीआरएस अध्यक्ष चंद्रशेखर राव की भूख हड़ताल के दबाव में हुई और इससे यह संदेश पहुंचा कि केन्द्र सरकार को भूख हड़ताल के इस हथियार के दम पर दबाया जा सकता है। यह मुद्दा आंध्र प्रदेश में ही बाद की घटनाओं से ज्यादा पुख्ता हुआ, जहां राज्य के विभाजन के खिलाफ कई भूख हड़ताल शुरू हो गईं। विजयवाड़ा से कांग्रेसी सांसद लगड़ापति राजगोपाल की भूख हड़ताल यह बताती है कि यह प्रभावी हथियार आज के नेताओं के हाथ कितना खतरनाक हो सकता है, बल्कि इसका मतलब ही बदल चुका है। चिदंबरम की तेलंगाना के पक्ष में घोषणा के तुरंत बाद 45 वर्षीय लोकसभा सांसद ने विभाजन के खिलाफ भूख हड़ताल की घोषणा कर दी।

रोसैया सरकार और मुसीबत नहीं चाहती थी इसलिए उसने उन्हें दो बार हैदराबाद में गिरफ्तार किया और विजयवाड़ा भेज दिया। इस तरह राजगोपाल की भूख हड़ताल 16 दिसम्बर को विजयवाड़ा में शुरू हुई। उनकी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल छठे दिन टूट गई, जब 1200 पुलिस वालों ने स्वराज मैदान में उनके कैम्प पर धावा मारा और उन्हें एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। वहां उन्होंने कुछ भी खाने-पीने से इंकार कर दिया। तब उन्हें ग्लूकोज चढ़ाया गया और उन पर पहरा देने के लिए 300 पुलिसवाले तैनात कर दिए गए। इसके बावजूद डायबिटीज के मरीज राजगोपाल अस्पताल से भाग गए और सरकार को शर्मिदा कर गए। वे अगली शाम 15 घंटे बाद निजाम इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (निम्स) में प्रकट हुए। वे निम्स में एक ऑटो रिक्शा से पहुंचे और एक बिस्तर पर कब्जा कर लिया। उन्हें पत्रकारों ने पहचान लिया और सरकार भी सक्रिय हो गई। इस बीच राज्य के विभिन्न हिस्सों में कई सारी भूख हड़तालें चल रही थीं। खासतौर पर विश्वविद्यालयों में, कुछ राजगोपाल के समर्थन में और कुछ विरोध में। सरकारी और निजी सम्पत्ति का नुकसान हर विरोध प्रदर्शन का अभिन्न हिस्सा था। कानून मंत्री और कांग्रेस के प्रभारी महासचिव वीरप्पा मोईली ने राजगोपाल से भूख हड़ताल खत्म करने के लिए एक व्यक्तिगत अपील भी जारी की।

एक सवाल जो राजगोपाल के समर्थन बार-बार पूछ रहे थे, वह यह था कि केन्द्र केसीआर की भूखहड़ताल के सामने तो झुक गई लेकिन उनके नेता की भूख हड़ताल पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रही। उनके विरोधी एक दूसरा प्रासंगिक सवाल पूछ रहे थे। सांसद महोदय विजयवाड़ा से हैदराबाद की कठिन यात्रा कैसे कर सके जबकि वे एक हफ्ते से भूख हड़ताल पर थे।

लगड़ापति ने इस सवाल का जवाब अगले दिन दिया। जब उन्होंने अपनी भूख हड़ताल नई दिल्ली से ‘एक उचित फैसले’ के आश्वासन के बाद तोड़ दी। उन्होंने कहा कि उनका उपवास तो तभी टूट गया था जब उन्हें अस्पताल में ग्लूकोज चढ़ाया गया था। राजगोपाल ने तब उपवासों को दो किस्मों में विभाजित किया। पहली किस्म वह है जिसे आजादी के आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने और तेलुगु भाषियों के लिए स्वतंत्र राज्य की स्थापना के लिए पोट्टीश्रीरामलु ने किया था। जिसमें उन्होंने एक बूंद पानी भी नहीं पिया था। दूसरे किस्म का उपवास वह है जैसा टीआरएस अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने किया था। इस भूख हड़ताल के आधुनिक संस्करण में भूख हड़ताली को सुई से ग्लूकोज और दूसरे पोषक तत्व चढ़ाए जाते हैं। उन्होंने कहा इस तरह से तो कोई व्यक्ति वर्षो तक भूख हड़ताल पर रह सकता है। अब प्रदेश में लोग यह मानने लगे हैं कि संप्रग सरकार और कांग्रेस पार्टी जिस तरह झुकी है उससे राजनैतिक ब्लैकमेल को मान्यता मिली है। इस प्रक्रिया में केसीआर जो राज्य की राजनीति में हाशिए पर पहुंच रहे थे, एक बार फिर से हीरो बन गए हैं। राज्य के विभाजन के पक्ष में विधानसभा और विधानपरिषद के सदस्यों के त्यागपत्र भी ऐसे ही राजनैतिक ब्लैकमेल को दर्शाते हैं और अब केन्द्र सरकार अगर अपने कमजोर दिल का प्रदर्शन करती है तो उसका रसूख और विश्वसनीयता दोनों खंडित होती हैं।
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं
radhaviswanath73@yahoo.com

 

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