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पीड़ा से प्रेम

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान परिसर में एक सज्जन मिले। उन्हें कैंसर था। उन्होंने कई वर्ष बीमारी में गुजारे थे। अभी भी कीमोथेरेपी चल रही थी। इस दर्दनाक प्रक्रिया के बारे में मैंने उनसे पूछते वक्त यही सोचा कि वे अपनी असह्य दर्द पर कोई तीखी टिप्पणी करेंगे या बीमारी का रोना रोएंगे। लेकिन आश्चर्य की उन्होंने इसकी जगह पीड़ा का बखान शुरू किया। उन्होंने विख्यात टेनिस खिलाड़ी आर्थर ऐश का एक प्रसंग सुनाया। आर्थर जिस समय कैंसर और एड्स से पीड़ित अस्पताल में अपना जीवन गुजार रहे थे एक मित्र उनसे मिलने आया। मित्र उन्हें देखते ही उपर की ओर मुंह किये बोल उठा- ‘ईश्वर, आर्थर के साथ ऐसा क्यों?’ इसके बाद आर्थर ने कहा नहीं मित्र ऐसा नहीं पूछते, क्या मैंने जब बिंबलडन जीता था तुमने ईश्वर से पूछा था कि आर्थर ही क्यों?’
    
बात कटु किंतु सच्ची है कि पीड़ा से हम नहीं बच सकते। दुनिया में डर, निराशा और अवसाद सदियों से मौजूद है और इसलिये प्रेम की तरह पीड़ा भी शाश्वत है। जरुरी है कि आप अपनी पीड़ा और दर्दं का प्रबंधन करना सीखें। पीड़ा का प्रबंधन हमारे दर्शन का भी एक खास अंग रहा है। योगी रमन ने हाथ की गांठ का ऑपरेशन बगैर बेहोश हुए करवाया। वे पीड़ा को महसूस भी करना चाहते थे और फिर अपनी आत्मिक शक्ति से उससे उबरना भी। आदि शंकराचार्य ने गुदा की दरारों से बहते खून की दर्दनाक स्थिति को परे हटाकर उपमहाद्वीप की लंबी पदयात्रा की। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने तो दूसरे का दर्दनाक रोग ग्रहण किया और पीड़ा को वैसे ही लिया जैसे खुशी, आशा जैसे सकारात्मक भावों को।
    
ये बातें बीतें जमाने की भले प्रतीत होती हों लेकिन इसकी प्रासंगिकता में कोई कमी नहीं आई है। दरअसल पीड़ा का सम्मान होना ही चाहिए। इसे दूर भगाने की कामना हो लेकिन बगैर इससे प्रेम किये नहीं क्योंकि बिना इस तरीके के यह संभव ही नहीं है। पीड़ा से प्रेम बगैर आपका शारीरिक-मानसिक तंत्र मजबूत नहीं हो सकता। यह प्रेम आपको लड़ने की ताकत भी देता है।

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