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आगत का स्वागत

नया वर्ष हमारे लिए कई उम्मीदें लेकर आया है। 2009 हालांकि कई मायनों में मुश्किल वर्ष था लेकिन उसने उम्मीदों के कई रौशनदान भी खोले जिनसे 2010 के रौशन होने का विश्वास किया जा सकता है। पिछले साल आर्थिक मंदी की मार जोरदार थी लेकिन उससे उबरने के चिह्न् भी थे। इस वर्ष हम उम्मीद कर सकते हैं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी और पूरी गति से तरक्की करेगी। पिछला वर्ष खराब मानसून और उसकी वजह से खराब खरीफ की फसल लेकर आया और अभूतपूर्व महंगाई का सामना भारतीयों को करना पड़ा है। महंगाई से राहत तो अब तक नहीं मिली है लेकिन उम्मीद है कि रबी की फसल अच्छी होगी और तब महंगाई की मार भी कम होगी। अर्थव्यवस्था में उतार चढ़ाव तो आते रहते हैं लेकिन हम जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब तेज विकास की राह पर है और ऐसा ही होता रहेगा। अब भारत को जिस चीज की सख्त जरूरत है वह है अच्छा प्रशासन। आजादी के बाद से हमारा प्रशासन हमारी अर्थव्यवस्था की तरह ही रहा है, उसमें अगर सुधार हुए भी हैं तो बहुत कम और वे भी धीरे-धीरे। पिछले दो दशकों से हमारी अर्थव्यवस्था तो सरपट दौड़ रही है लेकिन हमारे देश में प्रशासन अब भी पुराने जमाने की तरह ही रेंग रहा है। 2009 के अंत में चर्चित रुचिका प्रकरण ने यह दिखा दिया है कि हमारे तौर तरीके में क्या-क्या गलत है। हमने देखा कि पिछले उन्नीस वर्ष से जिन्होंने सजा भुगती वे लोग अपराधी नहीं अपराध के शिकार थे। जो व्यक्ति अपराधी था और उसके जो सहयोगी थे वे इस बीच न केवल चैन से रहे बल्कि तरक्की करते रहे। अगर हमने इसे नहीं बदला तो यह न सिर्फ हमारी अर्थव्यवस्था की तेजी को प्रभावित करेगा बल्कि हमारे नागरिकों में गहरा अविश्वास भी पैदा करेगी।

यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हमारे समाज में अब भी करोड़ों लोग हैं जो भरपेट खाना, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं। अगर इन्हें अर्थव्यवस्था की मूलधारा में लाना है तो एक जवाबदेह और संवेदनशील प्रशासन की जरूरत है जो नरेगा और सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार और लापरवाही न घोलें। सरकार के पास अब इतना पैसा है कि वह हजारों करोड़ रुपए की योजनाएं बना और लागू कर सकती है, जरूरत उस इच्छाशक्ति की है जो प्रशासन के केन्द्र में आम आदमी को लाए। नए साल में हम एक शुरुआत तो कर ही सकते हैं जिससे भविष्य में कोई रुचिका अपमान और बदसलूकी का शिकार होकर न मारी जाए और एसपीएस राठौर जैसे लोग तरक्कियां और मैडल न पा सकें।

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