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भ्रष्टाचारियों को मिले मृत्युदंड

भारत के संविधान में भ्रष्टाचारियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान होता तो आज यह देश पुन: सोने की चिड़िया कहलाता। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने सोचा भी नहीं होगा कि देश इतना भ्रष्ट हो जायेगा। जातीय तुष्टिकरण की नीति, न्याय मिलने की प्रक्रिया में देरी व जागरूकता न होने के कारण पंचायत स्तर से ही देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुका है। देश में नकली दूध, दही, घी, तेल और जाने क्या-क्या दैनिक उपयोग की चीजों और दवाओं में मिलावट व नकली माल बेचकर जनता को मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। ये कारोबारी कानून की लाचारी, धनबल, नौकरशाही की उदासीनता के कारण न्यायालय से छूट जाते हैं। नकली करेंसी का सीधा संबंध घूसखोरी आतंकवाद से है। देश में अगर पांच सौ और हजार के नोट छपने बंद हो जाएं, तो घूसखोरी व आतंकवाद में रोक लगेगी। राजनीतिज्ञों को देश की दशा से कोई लेना-देना नहीं है। मुट्ठीभर देश प्रेमी साधनहीन व कमजोर हैं, जबकि देश को लूटने वालों की संख्या ज्यादा है। देश हित में जरूरी है कि भ्रष्टाचारियों को कड़ा कानून बनाकर फांसी दी जाए।
मुकेश कुमार पाण्डे, देहरादून

सीएम की अपरिपक्वता
उत्तराखंड राज्य में निशंक सरकार का निर्णय जिसमें मंत्रियों एवं विधायकों के वेतन भत्तों में 25 प्रतिशत की वृद्धि मानसिक अपरिपक्वता का परिचायक है। एक तरफ राज्य की जनता प्राकृतिक प्रकोप (सूखे) से पीड़ित है, ऊपर से महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राज्य की जनता ने निशंक की ताजपोशी को एक परिवर्तन के रूप में देखा था, किन्तु आज आम जन हताश और निराश है। राज्य पर साढ़े बारह हजार करोड़ का कर्ज है। सत्ता सुख बरकरार रखने के लिए जनहित के मुद्दों की अनदेखी एवं औचित्यहीन निर्णय एवं घोषणाएं जारी हैं। विपक्ष की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस वोट की राजनीति के लिए तो शोर मचा रही है, किन्तु सैद्धान्तिक राजनीति से दूर माननीयों के वेतन भत्तों की वृद्धि पर मौन साधे हुए है। क्योंकि इससे उनके भी हित जुड़े हैं। जनता एवं वित्तीय हालत से किसी को  सरोकार नहीं। ऐसा लगता है कि जनता के धन की बंदरबाट में सभी चोर-चोर मौसेरे भाई का चरित्र निभा रहे हैं। कर्मचारियों की वेतन वृद्धि, माननीयों के वेतन वृद्धि एवं लाल बत्तियों का आवंटन, बड़े किसानों के गन्ना मूल्य वृद्धि के अतिरिक्त क्या अन्य लोग राज्य में नहीं है? असंगठित क्षेत्र के लोगों को दो जून की रोटी प्राप्त करना कितना कठिन हो रहा है, शायद यह माननीय मुख्यमंत्री की समझ से परे है।
गिरीश व्यास ‘उग्र’, उत्तरकाशी

हिन्दी का सम्मान करें
हमारे देश में हिन्दी भाषा के साथ जैसा सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, जो सही नहीं है। देश के लोगों में यह धारणा घर कर गई है कि अगर रोजगार पाना है तो अंग्रेजी पढ़ना जरूरी है। देश के 42 प्रतिशत लोगों के द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी लगातार अपमानित हो रही है। गांधीजी ने कहा था, ‘यदि किसी राष्ट्र को तरक्की करनी है तो उसे अपनी राष्ट्रभाषा में काम करना होगा।’ जापान और चीन  उदाहरण हैं। हमारे देश के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है। दूसरी अन्य भाषाएं इसके बाद आती हैं। सरकार को हिन्दी का प्रचार-प्रसार तेज करना होगा। देश के लोगों को भी राष्ट्रभाषा हिन्दी का सम्मान करना चाहिए। हिन्दी ही एकमात्र भाषा है जो हमें एकता के सूत्र में पिरो सकती है।
इंतिखाब आलम, बड़कोट, उत्तरकाशी

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