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उत्तराखंड 2009 : उठापटक के बीच निशंक बने सबसे कद्दावर नेता

अपने प्राकृतिक सौन्दर्य और धार्मिक आस्था के केंद्रों के लिए मशहूर उत्तराखण्ड राज्य में बीते साल में राजनैतिक उठापटक और सियासी जोड़तोड़ के बीच रमेश पोखरियाल निशंक सबसे कद्दावर नेता के रूप में उभरे जिसके चलते उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी का तोहफा मिला।

राज्य में बीते साल लोकसभा के आम चुनावों के बाद राज्य की पांच की पांचों सीटों पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी धराशायी हो गई। हार के बाद पार्टी द्वारा राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के लिए उठाए गए कदमों के बीच आपस में ही विभिन्न नेताओं के बीच जो खींचतान मची, उसमें सबसे अधिक कद्दावर नेता के रूप में निशंक उभर कर आए और मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें मिली।

बीते साल में राज्य में करीब 70 वर्षीय भुवन चंद्र खण्डूरी को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद नए मुख्यमंत्री की दौड़ में पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोशियारी, प्रदेश अध्यक्ष बचीसिंह रावत के अलावा खण्डूरी मंत्रिमण्डल के मंत्रियों में प्रकाश पंत, त्रिवेन्द्रसिंह रावत और निशंक का नाम प्रमुख रूप से सामने आया था।

बीते साल में भाजपा की आपसी खींचतान के चलते निशंक ने एक- एक कर अपने ही दल के सभी नेताओं को पीछे छोड़ा और अंत में जब विधायक दल के नेता पद के लिए मतदान कराया गया तो निशंक को 23 विधायकों का समर्थन मिला। प्रकाश पंत 12 विधायकों का ही समर्थन जुटा पाए।

आपसी घमासान के बाद नेता के रूप में उभरे निशंक ने 27 जून को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली और चार महीने के बाद राज्य के विकास के लिए विजन 2020 का लक्ष्य रखकर न केवल अपनी ही पार्टी के बड़बोले नेताओं की बोलती बंद की बल्कि विपक्षियों को भी चुप रहने को मजबूर किया। निशंक के विजन 2020 का असर ऐसा रहा कि विकासनगर विधानसभा क्षेत्र के लिए हुए चुनाव में भाजपा जहां तीसरे नम्बर पर खड़ी थी वहीं उछलकर उसने इस सीट को जीत लिया ।


बीते साल निशंक सरकार के विजन 2020 ने विपक्षियों को भी इतना प्रभावित किया कि उन्होंने मिशन 2012 का नारा दे दिया। वर्ष 2012 में ही राज्य में विधानसभा के लिए आम चुनाव होने वाले हैं। राज्य में राजनैतिक उथल -पुथल के बीच ही भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष बचीसिंह रावत को भी उनके पद से हटा दिया गया और उनके स्थान पर बिशनसिंह चुफाल को पार्टी अध्यक्ष मनोनीत किया गया। बाद में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष औपचारिक रूप से निर्वाचित किया गया।

गुजरे साल में 25 जून को खण्डूरी ने भारी मन से इस्तीफा दे दिया। इसके अगले दिन 26 जून को राज्यपाल ने विधायक दल के नेता चुने गए रमेश पोखरियाल निशंक को राज्य में नई सरकार बनाने का न्यौता दिया। बीते साल में सत्तारूढ़ भाजपा ने 14 सितम्बर को हुए उपचुनाव को जीतकर राज्य में पहली बार अपने बलबूते पर बहुमत हासिल कर लिया।

उत्तराखण्ड की राजनीति में 17 जून को उस समय भूचाल आ गया जब राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोशियारी ने अपने ही दल के खण्डूरी को हटाने के लिए दबाव बनाते हुए सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि उनको बाद में मनाया गया और उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया।

राज्य में गुजरे साल में ही सत्तारूढ़ भाजपा को एक करारा झटका उस समय लगा जब इसके विधायक मुन्नासिंह चौहान ने छह अप्रैल को इस्तीफा दे दिया और नौ अप्रैल को बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए। बाद में उनको बसपा ने भी बड़बोलेपन के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया।

राज्य में पहली बार राज्य विधानसभा में उपाध्यक्ष पद को परम्परा से हटकर सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने पास रखा और विजय बड़थ्वाल को उपाध्यक्ष चुन लिया। हालांकि राज्य मंत्रिमडल में शामिल होने के बाद बडथ्वाल ने एक जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

राजनैतिक मोर्चे पर गुजरे साल में प्रमुख विपक्षी कांग्रेस के नेता और विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के उपनेता तिलकराज बेहड़ ने भाजपा के एक नेता द्वारा जान से मारने की धमकी दिए जाने पर 13 जुलाई को पूरे दिन सदन नहीं चलने दिया।

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