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दो टूक (31 दिसंबर, 2009)

इसे हमारी तेजरफ्तार जिंदगी की विडंबना कहिए कि कोहरा भी कहर बन जाता है। बुधवार को जिस तरह एक्सप्रेस हाईवे पर सात गाड़ियां भिड़ीं, उसके लिए कुदरत को दोष दें या हमारी भागमभाग को, कहना मुश्किल है। 

हम लोग सहज अनुशासन में यकीन नहीं करते। ट्रैफिक के नियम तो जैसे हमारी मजबूरी हैं। कुल मिलाकर हादसे कुदरती हों या करतूती, संदेश संभलकर चलने का ही देते हैं।

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