अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

खामोश बदलाव का एक वर्ष

इतिहास को हम तिथियों और वर्षो से याद करते हैं। प्लासी का युद्ध 1757 में हुआ था और पानीपत में मराठों की पराजय 14 फरवरी 1761 को हुई थी। 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों ने संग्राम लड़ा था तो अक्टूबर क्रांति 1917 में हुई थी। भारत छोड़ो आंदोलन 42 का आंदोलन कहलाता है तो आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली। इस तरह देखा जाए तो बीता वर्ष 2009 इतिहास में किसी विशेष वर्ष की तरह दर्ज नहीं हो सकता। 

शायद यह वर्ष भविष्य में इतिहास के छात्रों को ज्यादा परेशान नहीं करेगा। 2008 फिर भी महत्वपूर्ण वर्ष था। अमेरिका में पहला अश्वेत राष्ट्रपति चुना गया जिसकी उदारवादिता अमेरिकी स्तर के हिसाब से कुछ ज्यादा ही थी और जिसके नाम में ‘हुसैन’ लगा था। विश्वव्यापी आर्थिक संकट भी 2008 में शुरू हुआ था जिसे कुछ लोग अमेरिकी वर्चस्व के अंत की शुरुआत और एक नई वैश्विक अर्थनीति और राजनीति के उदय के खयाल पालने लगे थे।

2009 में हम वे ही संकट झेलते रहे जो पिछले बरसों में शुरू हुए थे। आतंकवाद ज्यादा खतरनाक हो गया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में अराजकता बढ़ी, आर्थिक मंदी से उबरने की शुरुआत हुई, भारत और चीन का आर्थिक दबाव बढ़ता रहा, पर्यावरण प्रदूषित होता रहा। कोपनहेगन शायद इस साल को याद करने का एक आधार हो सकता था, लेकिन वहां भी कुछ नहीं हुआ, बस यही साबित हुआ कि पर्यावरण पर इतना लचीलापन चाहिए कि अंत में किसी बात का कुछ मतलब न निकले।
    
लेकिन जैसे कि कक्षा में कोई भी छात्र औसत नहीं होता, उसकी कुछ विशिष्टता होती है, जिसे उस वक्त नहीं पहचाना जाता। वैसे ही कोई भी साल औसत नहीं होता, मनुष्य नियति और इतिहास की कक्षा में उसकी विशिष्ट भूमिका होती है। इतिहास की फिल्म में कोई एक्स्ट्रा नहीं होता, सब अपने-अपने स्तर पर नायक होते हैं। आखिरकार जब अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीती तो कौन जानता था कि यह भारत के ही नहीं विश्व के इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई होगी, यहां से धन का प्रवाह उल्टी दिशा में, भारत से इंग्लैंड की ओर बहने लगेगा, औद्योगिक क्रांति को जरूरी पूंजी मिलेगी, इतिहास में एक नया युग शुरू होगा।

तब मराठे अपनी लड़ाई में मुब्तिला थे, जाट अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे, अब्दाली भारत पर और आक्रमणों पर गौर कर रहा था, सिखों के अपने सरोकार थे, मुगल राज अपने खंडहरों पर बैठा था। 2009 जरूरी नहीं कि इतना ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन ऐसा भी नहीं कि हम उसे यूं ही छोड़ दें। इतिहास जितना बड़ी घटनाओं से बनता है, उससे ज्यादा बीच के दौर में निर्णायक मोड़ लेता है। मसलन शायद हम पाएं कि 2009 वह वर्ष था जिसने औद्योगिक क्रांति के बाद इतिहास की धारा विकसित देशों से विकासशील देशों की ओर मोड़ दी। यह तो सब स्वीकार कर चुके हैं कि वैश्विक मंदी ने अमेरिका की आर्थिक हैसियत में दरारें डाल दी हैं और यह भी कि उबरने की कुंजी भारत, चीन, ब्राजील जैसे देशों के पास है। धीरे-धीरे ये देश जब विश्व अर्थव्यवस्था में प्रभावशाली होंगे तो अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की शक्ल भी बदलेगी।

इसकी बुनियादी वजह यह है कि किफायतशारी इन समाजों के चरित्र में है, और ये देश जानते हैं कि उन्हें संसाधनों के मामले में वह छूट नहीं मिल सकती जो विकसित देशों को मिले थे। उनकी आबादी कम थी और धरती के समूचे संसाधन उन्हें उपलब्ध थे। औद्योगिक क्रांति के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि विश्व अर्थव्यवस्था में ऐसे देश प्रभावी हो रहे हैं जिनका उद्देश्य विश्व आर्थिक व्यवस्था पर छाना या थोड़े से लोगों के लिए ढेर सारे साधन जुटाना नहीं है बल्कि बहुत बड़ी आबादी के लिए एक सम्मानजनक जीवनस्तर जुटाना है। आखिरकार दुनिया की दो तिहाई से ज्यादा आबादी के लिए यह परिवर्तन महत्वपूर्ण होगा।

इसका सीधा दबाव विकसित राष्ट्रों के तौर तरीकों पर पड़ेगा। इसीलिए पश्चिमी संस्थान यह दावा कर रहे हैं कि चूल्हे से निकलने वाली कालिख खनिज तेजों के धुएं से ज्यादा खतरनाक है। इसे इस तरह देखें, कि अगर वैश्विक मंदी न होती, इस मंदी से उबरने में ‘बेसिक’ देशों की अर्थव्यवस्थाओं की मजबूती न दिखती, तो क्या कोपनहेगन में विकसित देशों का रुख इतना कड़ा और अड़ियल होता? क्या वे छोटे अविकसित देशों को इन देशों के खिलाफ खड़ा करने के लिए षडयंत्र रचते? वैश्विक मंदी के बाद का आर्थिक परिदृश्य और कोपनहेगन दो अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।     

दूसरा सबक 2009 का शायद यह है कि आतंकवाद जैसी समस्याओं का कोई तुरंत हल नहीं है। अमेरिका में दो राष्ट्रपति हो गए जो दो विरोधी ध्रुवों पर हैं- जॉर्ज बुश और बराक ओबामा। दोनों ने अपने-अपने तरीके अपना लिए और अफगानिस्तान-पाकिस्तान में लगभग वही स्थिति है या उसी गति से बिगड़ रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि आतंकवाद का कोई हल नहीं है या उससे जीता नहीं जा सकता।

लेकिन एक बात साफ है कि जैसे उससे जीतने की कोशिश हो रही है वैसे जीतना मुश्किल है या जीत की इतनी बड़ी कीमत होगी कि उससे दुनिया का शक्ति संतुलन बदल जाएगा। या इसे ऐसे कहें कि दुनिया का शक्ति संतुलन बदले बिना इस समस्या से निपटने की कोशिश बेकार होगी। अमेरिका को यह समझना होगा कि सिर्फ नाटो देशों के भरोसे यह लड़ाई वह नहीं जीत पाएगा, भले ही उसके पास कितने ही हथियार हों। अजीब बात है कि दुनिया के जिस भूभाग में यह युद्ध चल रहा है, उस भूभाग का कोई देश प्रत्यक्ष रूप से इस लड़ाई में नहीं है, फौजी या तो अमेरिका से आए हैं या यूरोप से।
   
जिस तरह विश्व अर्थव्यवस्था में नई ताकतें उभरी हैं वैसे ही विश्व राजनीति में नए किस्म की राजनीति की शायद शुरुआत हो चुकी है जिसमें विकेंद्रीकरण और स्थानीय विशिष्टताओं की भूमिका बड़ी होगी। अब लोकतंत्र वह नहीं होगा जो यूरोप और अमेरिका बाकी दुनिया पर थोपेंगे, लोकतंत्र वह होगा जिसे समाज अपने ढंग से विकसित करेंगे। मनुष्य जाति के इतिहास में यह उम्मीद तो बंधती है कि दुनिया पर्यावरण संकट से भी निपट लेगी और आतंकवाद से भी, लेकिन इस बदलाव में बहुत सारी चीजें वही नहीं रहेंगी। भविष्य के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन शायद इस बदलाव की शुरुआत हो गई है और इतिहास के किसी भी बड़े बदलाव की तरह यह शुरुआत भी खामोशी से हुई है।

लेखक हिंदुस्तान में एसोशिएट एडीटर हैं

rajendra.dhodapkar@hindustantimes.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:खामोश बदलाव का एक वर्ष