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खेल है झेल!

कहा जा रहा है कि फिरोजशाह कोटला मैदान में जो कुछ हुआ उसे भारत कलंकित हुआ है। जिस पिच पर ये मैच खेला गया, वो डीडीए की घटिया राजनीति से भी ज्यादा बुरी थी। उस विकेट पर अगर कुछ देर और मैच होता, तो भारत-श्रीलंका के आपसी सम्बन्ध खतरे में पड़ सकते थे। 23 ओवर की बल्लेबाजी में श्रीलंकाई बल्लेबाजों ने इतने जख्म खाए, जितने उन्होंने लाहौर आतंकी हमले भी नहीं खाए होंगे। अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस सबके लिए जिम्मेदार कौन हैं? लोग तंज कर रहे हैं कि अगर ढंग की पिच नहीं बना सकते तो बेहतर होगा कि स्टेडियम को बैंक्वेट हॉल में तब्दील कर दो।
    
मगर समस्या की गहराई में उतरने पर मुझे लगता है कि हमें हर खेल शौकिया ही खेलना चाहिए, पेशेवर या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का विचार छोड़ देना चाहिए। फुटबॉल खेलें, तो मोहन बगान को मोहम्डन स्पोर्टिंग से खेलना चाहिए। हॉकी खेलें, तो इंडियन ऑयल को रेलवे से खेलना चाहिए और क्रिकेट खेलें तो मुम्बई और दिल्ली ही आपस में खेलें, तो बेहतर होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने पर एक तो परफार्म करना पड़ता है और दूसरा उसका आयोजन करना होता है।

हमें कोई जरूरत नहीं है कि हॉकी में हालैंड से छह-एक से हार अपनी भद्द पिटवाएं। आठ लोगों की फर्राटा दौड़ में नवें स्थान पर आएं। कमनवेल्थ खेलों के रूप में उड़ता तीर ले हर दिन अपनी बेइज्जती करवाएं। हॉकी विश्व कप का आयोजन का जिम्मा लें हर महीने अंतराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन से डांट खाएं।
    
हम जैसे हैं, वैसे ही बेहतर हैं। अराजकता हमारी कार्य संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। सिर्फ इसलिए हम अपने संस्कार नहीं त्याग सकते क्योंकि फलां आयोजन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है। किसी भी कीमत पर चलताऊ  रवैये के प्रति हमें अपनी प्रतिबद्घता कम नहीं करनी है। लेकिन यह सब तभी हो सकेगा जब हम सिर्फ घर पर ही अपने भाई-बहनों के साथ खेलें। उसमें भी आइस-पाइस, कैरम, लूडो हमारी प्राथमिकता हो।

क्रिकेट खेलें भी तो दोस्तों के साथ घर की बॉलकनी में या फिर गली में। वरना होगा ये कि कोई भी माइकल फेनेल हमें कभी भी झाड़ लगा देगा। वेटलिफ्टिंग फेडरेशन डोप टेस्ट में फेल होने पर हम पर दो साल का बैन लगा देगी। हमें तो राष्ट्रीय स्तर के ऐसे ही आयोजन चाहिए जहां न कोई डोप टेस्ट हो न कोई अंतरराष्ट्रीय मापदंड हो, तभी कोटला जैसे कलंकों से बचा जा सकेगा! और अपनी वाली करते हुए हम अपने तरीके से खेल पाएंगें!

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