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शिबू सोरेन का आना

अतीत के राजनीतिक संघर्ष का भारी बोझ लिए शिबू सोरेन ने जब तीसरी बार झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो राज्य की जनता के मन में उम्मीदों से ज्यादा आशंकाएं तैरने लगीं। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। फायदा यह है कि शिबू सोरेन यानी गुरुजी से जनता के जल्दी निराश होने का कोई सवाल नहीं है।

नुकसान यह है कि राज्य में नई सरकार के साथ नए साल में कुछ नया काम करने का कोई उत्साह नहीं है। लेकिन इससे गुरुजी के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां कम नहीं हो जातीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ भाजपा और आजसू को साथ लेकर चलने की चुनौती अपनी जगह बरकरार है। वह चुनौती त्रिकोणीय राजनीतिक खींचतान के बीच लगातार संतुलन कायम करने की होगी।

भाजपा अध्यक्ष रघुवर दास और आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो को उपमुख्यमंत्री बना कर गुरुजी ने मंत्रिमंडल में जो राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की वह मंत्रियों के स्तर तक नहीं बन पाया है। दूसरी लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती है नक्सलवाद की समस्या। विधानसभा चुनावों के दौरान जो सुरक्षा बल वहां तैनात किए गए थे वे अभी तक जमे हुए हैं। केंद्र सरकार ने वहां नक्सलियों पर कार्रवाई का इरादा बार-बार जताया है। लेकिन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही गुरुजी ने घोषणा की है कि वे छह महीने के भीतर माओवादियों से बात करेंगे। 

यह तालमेल कैसे बनेगा यह अभी देखा जाना है। तीसरी बड़ी चुनौती अतीत के उन आपराधिक मुकदमों की है जो कभी राजनीतिक आंदोलन के दौरान तो कभी सत्ता की जोड़-तोड़ के दौरान गुरुजी के सिर पर सवार हो गए और आज भी भूतों की तरह उनका पीछा कर रहे हैं। गुरुजी अपनी राजनीतिक ताकत के बूते पर उन्हें परास्त करते हैं या वे न्यायपालिका की मदद से गुरुजी की सत्ता पर फिर ग्रहण बनते हैं यह देखा जाना है। वे आंदोलन के बड़े नेता रहे हैं और उनकी जमीनी पकड़ राज्य में किसी भी नेता के मुकाबले मजबूत है। इसीलिए विपरीत हवाओं के बावजूद वे इस आदिवासी राज्य की राजनीतिक मजबूरी बने रहते हैं।

तमाम राजनीतिक सीमाओं और आरोपों के बावजूद वे आदिवासी समाज में लोकतंत्र की मुख्यधारा के प्रति एक विश्वास बहाल करने में सहायक हो सकते हैं। इस चुनाव में भी माओवादियों ने मुख्यधारा में आने के प्रयास किए और आगे भी करेंगे। जीतने वाली पार्टियों में कुछ लोग उस पृष्ठभूमि से जुड़े बताए भी जाते हैं। हमें भी यह मानना चाहिए कि जिस तरह माओवाद झारखंड की अनिवार्य राजनीतिक प्रक्रिया बन गया है उसी तरह शिबू सोरेन भी वहां की अनिवार्य ऐतिहासिक प्रक्रिया हैं।

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