अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

महंगाई बढ़ाने वाला साल था यह

अगर 2009 को ‘मंहगाई बढ़ोत्तरी का वर्ष’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस साल नन्हे बच्चों का निवाला दूध बहुत मंहगा हो गया, हम बच्चों को पेप्सी या कोई कोल्ड ड्रिंक तो दे सकते हैं लेकिन दूध नहीं। आम जनता की सवारी बस का किराया बढ़ जाने से आम आदमी पैदल चलने के लिए मजबूर है। यहां तक कि पानी पीकर पेट भरना भी अब मंहगा हो गया है। मेट्रो के आने से लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई थी, अब वह भी लोगों पर कहर बरपा रही हैं। मध्यमवर्गीय परिवार ही इतने परेशान हैं तो निम्नवर्ग कैसे अपना गुजर-बसर करता होगा।
मधु विनायक, रोहिणी, दिल्ली

उलझ कर रह जाएगा विकास
छोटे राज्यों की माँग लगातार बढ़ती ही जा रही है। कहा जा रहा है कि इससे पिछड़े इलाकों का विकास होगा। मेरा मानना है कि इन राज्यों के बँटवारे पर जितना धन खर्च होगा, वह इन राज्यों के पिछड़े इलाकों में लग जाए तो इनका विकास हो जाएगा। ऐसा नहीं कि बंटवारा होते ही इन इलाकों में विकास की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। बँटवारे की घोषणा होने के बाद तीन-चार साल बँटवारे की प्रक्रिया पूरी होने में लगेंगे। इसके बाद, बिहार और झारखंड की तरह अधिकारी दोनों राज्यों के बीच झुलते रहेंगे। यही नहीं, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी पाँच सालों तक चलेगा, हो सकता है इससे भी लंबा चले। इस बीच आम जनता का विकास हो-न-हो, नेताओं का विकास जरूर हो जाएगा। 
निक्की तिवारी

बेचारी जनता
सरकार चाहे केंद्र कि हो या राज्य की जनता से पैसा ऐंठने में कोई कसर नहीं  छोड़ती। दिल्ली सरकार हाल ही में सरकारी बसों कि किराये बढ़ाए वो भी जरूरत से ज्यादा। जनता धरना तथा प्रदर्शन करती। जनता अभी बेचारी इस मुसीबत से उबर भी न पाई थी कि डीटीसी की लोफ्लोर वाली बस में आग लगने कि घटना रोजाना बढ़ती जा रही हैं और अब जनता को पैसे के साथ साथ समय भी बरबाद करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
मोहम्मद अस्फहानी खान, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

मीडिया ध्यान दे
हमारे समाज में आए दिन कोई न कोई वारदात या घटनाएं होती रहती हैं, आरोपियों की धरपकड़ में मीडिया निस्संदेह रूप से बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है जिसके लिए वह बधाई का पात्र है। कई बार आरोपी बेकसूर होते हैं परंतु तत्काल परिस्थिति में वे या तो फंस जाते हैं या फंसा दिए जाते हैं। जोकि आगे चल कर अदालत द्वारा निर्दोष या बेकसूर करार दिए जाते हैं। आरोपी जब पकड़े जाते हैं तो मीडिया उनके नाम व फोटो सहित बिना सत्य की गहराई में गए लम्बी चौड़ी खबर छाप देता है। परंतु वही लोग जब बेकसूर साबित हो कर छूट जाते हैं तो मीडिया उनके बारे में कोई भी समाचार प्रकाशित नहीं करता। क्या ये मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे अदालत के निर्णयों को प्रमुखता के साथ प्रकाशित करे। कुछ निर्णयों को प्रकाशित भी किया जाता है परंतु वे या तो हाई प्रोफाइल केस होते हैं।
रवि कान्त मिश्र, फुलवरियां, वाराणसी

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:महंगाई बढ़ाने वाला साल था यह
पहला एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच
इंग्लैंड36/1(9.2)
vs
न्यूजीलैंडबैटिंग बाकी
Sun, 25 Feb 2018 06:30 AM IST
तीसरा टी-20 अंतरराष्ट्रीय
भारत172/7(20.0)
vs
दक्षिण अफ्रीका165/6(20.0)
भारत ने दक्षिण अफ्रीका को 7 रनो से हराया
Sat, 24 Feb 2018 09:30 PM IST
दूसरा एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच
न्यूजीलैंड
vs
इंग्लैंड
बे ओवल, माउंट मैंगनुई
Wed, 28 Feb 2018 06:30 AM IST