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न भूलने वाले अवस्थीजी

न भूलने वाले अवस्थीजी

हो सकता है कि आप में से बहुत से लोग राजेन्द्र अवस्थी को न जानते हों। लेकिन उनसे पूछिए जो राजेन्द्र अवस्थी को जानते हैं, जिन्होंने उनके साथ काम किया है और उन्हें, जिन्होंने उनके साथ पूरे एक युग को जिया है। दस-ग्यारह वर्ष पुरानी घटना है।

अवस्थीजी राजस्थान पत्रिका के एक कार्यक्रम में जयपुर गए हुए थे। मैं भी उनके साथ था। वहां उनकी मुलाकात पत्रकारिता के श्लाका पुरुष कर्पूर चंद कुलिशजी से हुई। अवस्थीजी पूछ बैठे- ‘कुलिशजी मैं राजेन्द्र अवस्थी हूं। क्या आपने पहचाना?’ कुलिशजी का जवाब था- ‘राजेन्द्र अवस्थी कोई भूलने की चीज है?’ इसके बाद बातें तो बहुत हुईं लेकिन न भूलने वाली बात याद रह गई। अवस्थीजी किसी के लिए दोस्त थे तो किसी के लिए प्रेमी। ‘गुरुजी’ तो न जाने वे कितनो के होंगे। पक्के यारबाज। दोस्ती में किसी भी हद तक चले जाने वाले। सहज इतने कि ऑफिस के बाहर कभी ‘बॉस’ नहीं हो पाए। कभी न हार मानने वाले। जीते जी तो उनका संघर्ष देखा ही। मृत्यु से तेरह दिन पूर्व का संघर्ष भी देखा। मृत्यु बार-बार उनके पास आती रहती और वे लगातार उसे ज़िदगी का रास्ता दिखाते रहे।

बड़ी बात नहीं जब मौत ने भी थक-हार कर उसे विनती की हो कि ‘गुरुजी’ अगर आप हमारे साथ नहीं चले तो विधि के विधान में रुकावट आ जाएगी। तब पत्रकारिता के भीष्म पितामह ने सोचा होगा कि नहीं अपनी जीत के लिए वे दूसरे को पराजित नहीं करेंगे, ईश्वर की इच्छा का सम्मान हो, यही सोच कर उन्होंने इस दुनिया से दूसरी दुनिया में जाने निर्णय ले लिया हो। उनके इस निर्णय से हम और आप ही नहीं, पूरा साहित्यिक और पत्रिकारिता जगत स्तब्ध है, शोकमग्न है। अवस्थीजी का सम्म्मान सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे कथाकार, संपादक, विचारक, तंत्र-मंत्र के ज्ञाता थे। बल्कि इसलिए है कि वे जिसके साथ खड़े हो जाते थे उस व्यक्ति का कद बुलंदियां छूने लगता था। आज की दुनिया में कद छोटा करने वाले तो बहुत मिलेंगे लेकिन दूसरों का कद बड़ा करने वाले अवस्थीजी जैसे विरले ही हैं।

उन्होंने मछली बाजार, भंगी दरवाजा, जंगल के फूल, बीमार शहर, सूरज किरण की छांव जैसे कई बहुचर्चित उपन्यास लिखे। एक फिसलती हुई मछली, एक औरत से इंटरव्यू और दो जोड़ी आँखें जैसे कहानी-संग्रह भी खूब चर्चित हुए। जबलपुर में जन्में। नागपुर से ‘नवभारत’ से अपना करियर शुरू करने वाले अवस्थीजी ‘सारिका’ से होते हुए बाल पत्रिका ‘नंदन’ के पहले संपादक और फिर इक्कतीस साल तक ‘कादम्बिनी’ का संपादन। स्वर्गीय मनोहर श्याम जोशी के बाद तीन साल तक ‘कादम्बिनी’ के साथ-साथ ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का भी संपादन किया। कामयाबी और शोहरत तो जैसे अवस्थीजी के कदम चूमने को बेताब रहा करती थी। उनके संपादन में निकाले गए ‘कादम्बिनी’ के तंत्र विशेषांकों को लोग आज भी नहीं भूला पाए हैं। उस जमाने में उनके बहुत से प्रशंसक तो उनके लिखे ‘काल-चिंतन’ के कारण ही ‘कादम्बिनी’ लेते थे।

दुनिया का ऐसा कौन सा कोना हो जो उन्होंने न देखा हो। उनकी इसी घूमंतु आदत के कारण उन्हें इंडियन एयरलाइंस द्वारा ‘विश्व यात्री’ का सम्मान भी दिया गया था। बस घूमने को एक यही अनंत की यात्रा रह गई थी अवस्थीजी के लिए। सो आज वे इस इस यात्रा पर भी चल दिए, वापसी का टिकट लिए बिना ही। 

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