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शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के अध्यक्ष शिबू सोरेन ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव देखे हैं लेकिन बुधवार को उन्होंने राज्य के सातवें मुख्यमंत्री के रुप में शपथ लेकर अपनी एक अलग पहचान कायम करने में सफलता हासिल कर ली है। 
 
11 जनवरी 1944 में तत्कालीन हजारीबाग जिले के गोला प्रखंड के नेमरा गांव में जनमे और राज्य में तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले सोरेन की कर्मभूमि दुमका रही है। नेमरा ने जन्म दिया तो दुमका ने उन्हें गुरु और दिशोम गुरु के तमगों से नवाजा। बाल्यावस्था में शिबू सोरेन ने अंग्रेजों के जमाने में महाजनों के जुल्म को करीब से देखा और सहा है। महाजनों के जुल्म के शिकार उनके पिता सोबरन सोरेन भी हुए। वह बचपन में ही महाजनी प्रथा और आदिवासी समाज में व्याप्त हडि़या दारु के प्रचलन को जड़ मूल से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेकर घर से निकल पड़े।
 
आदिवासी समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए सोरेन धनबाद के टुंडी प्रखंड क्षेत्र में आश्रम स्थापित कर लोगों को संदेश देने लगे। सार के दशक में शिबू सोने को झारखंड अलग राज्य आंदोलन को नए सिरे से शुरु करने के लिए बिनोद बिहारी महतों और मार्क्सवादी कॉ-आर्डिनेशन कमेटी (एमसीसी) के संस्थापक ऐ के राय ने प्रेरित किया। इस प्रेरणा को मंत्र मानकर शिबू सोरेन राजनीति के क्षेत्र में कूद पड़े और पहली बारी 1977 में टुंडी विधानसभा क्षेत्र में अपने भाग्य की आजमाईश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके पहले शिबू सोरेन आदिवासी बहुल संथलापरगना के ग्रामीण इलाकों में घूम-घूम कर सामज में व्याप्त कुरीतियों से मुक्त होने का संदेश देते रहे।
 
इसी क्रम में 1975 में जामताड़ा का चिरुडीह कांड 23 जनवरी 1975 को हुआ जिसमें कई लोगों की हत्या हो गई। यह कांड वर्षों तक सुर्खियों में रहा। जिस वजह से सोरेन को 2004 की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में केन्द्रीय कोयला मंत्री पद से त्यागपत्र देने के लिए विवश होना पड़ा।
 
सोरेन का राजनीतिक जीवन उतार-चढाव भरा रहा है। विषम परिस्थितियों में भी वे संथाल परगना की जनता में लोकप्रिय बने रहे। बाद में इस क्षेत्र के लोग गुरुजी के संबोधन से उन्हें सम्मानित करने लगे। वर्ष 1977 में टुंडी विधानसभा में चुनाव हारने के बाद सोरेन ने हार नहीं मानी और उन्होंने पूर्ण रुप से संथाल परगना को अपनी कर्मभूमि बनाकर झारखंड अलग राज्य निर्माण के आंदोलन का अलख जगाते रहे।

सोरेन 1980 में मध्यावधि चुनाव में दुमका (सु) लोकसभा क्षेत्र में जीत दर्ज कर समूचे देश मे अलग झारखंड राज्य निर्माण के मुद्दे को स्थापित करने में सफल हुए।

 वर्ष 1980 में विधानसभा चुनाव में भी संथाल परगना के 18 में से नौ सीटों पर झामुमो के प्रत्याशियों के निर्वाचित होने से बिहार की राजनीति मे हलचल पैदा हो गई। हालांकि 1984 के लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन दुमका में कांग्रेस के पृथ्वीचन्द्र किस्कू से पराजित हो गए लेकिन 1985 मे हुए विधानसभा चुनाव में शिबू सोरेन के नेतृत्व में संथाल परगना में झामुमो का जलवा बरकरार रहा।
 
गुरुजी जामा से विधायक चुने गए और उतार चढ़ाव के बावजूद भी उन्होंने संथाल परगना को नहीं छोड़ा। वर्ष 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठित विपक्षी गठबंधन के साझा उम्मीदवार के रुप में शिबू सोरेन दुमका से पुन: सांसद बने जबकि राजमहल से झामुमो के ही साईमन मरांडी निर्वाचित हुए।
 
वर्ष 1990 में सम्पन्न बिहार विधानसभा चुनाव में भी संथाल परगना में झामुमो सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी। वर्ष 1991 और 1996 में सोरेन दुमका लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित होते रहे। वर्ष 1998 में सोरेन दुमका में तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता बाबूलाल मरांडी से पराजित हो गए। इसके बाद उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनने का मौका मिला लेकिन न्यायालय ने उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया।

वर्ष 1999 में दुमका में मरांडी के मुकाबले झामुमो ने दिसोम गुरु की धर्मपत्नी रुपी सोरेन को मैदान में उतारा। मरांडी महज 4500 मतों से ही यह चुनाव जीत पाए। सोरेन वर्ष 2002 में झारखंड से राज्यसभा के सदस्य चुने गए। हालांकि उनकी सफलता में भाजपा का भी सहयोग रहा था। मरांडी के 15 नवंबर 2000 को राज्य का मुख्यमंत्री बनने के कारण दुमका लोकसभा सीट रिक्त हुई थी लेकिन इस सीट पर उप चुनाव वर्ष 2002 में कराया गया और एक बार फिर शिबू सोरेन दुमका (सु) संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। इस उपचुनाव में झामुमो के सोरेन ने भाजपा के रमेश हेम्ब्रम को लगभग 94 हजार से अधिक मतों से हराया था।
 
वर्ष 2004 में एक बार फिर सोरेन भाजपा के सोनेलाल हेम्ब्रम को लगभग 1.15 लाख से अधिक मतों से पराजित कर दुमका से लोकसभा के सदस्य चुने गए। वर्ष 2009 के जनवरी में सोरेन तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में राजा पीटर से पराजित हो गए और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गवांनी पडी। इसके बाद वर्ष 2009 में ही लोकसभा चुनाव के साथ ही जामताड़ा विधानसभा का उपचुनाव हुआ और दोनों में सोरेन विजई रहे। बाद में सोरेन ने जामताड़ा विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और लोकसभा की सदस्यता बरकरार रखी। सोरेन अब तक तीन बार राज्य में मुख्यमंत्री बने हैं और तीनों ही बार वह लोकसभा के सदस्य रहते हुए ही मुख्यमंत्री बने हैं।

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