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सूखा-बाढ़ झेलने वाले बीजों का हुआ विकास

देश में अनाज और सब्जियों की नई उन्नत किस्म तथा संसाधनों के बेहतर उपयोग की नयी तकनीकों के विकास की दष्टि से वर्ष 2009 में भारतीय कृषि विज्ञान ने सफलता के नये आयाम जोड़े। मगर इस दौरान भारतीय कृषि ने डा़ नॉरमन बोरलॉग के निधन से अपना सच्चा मित्र और हितैषी खो दिया।

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डा बोरलॉग ने भारत में अन्न उत्पादन बढ़ाने की हरित क्रांति में उस समय योगदान किया था जब देश भोजन के लिए आयात पर निर्भर था। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) ने बोरलॉग की स्मति में जैव प्रौद्योगिकी से सफल सुधार के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय प्रोफेसर चेयर की स्थापना की है।

वर्ष के दौरान देश के कषि वैज्ञानिकों के लिए बड़े गौरव का अवसर उस समय आया जबकि 6 जून, 2009 को राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल में नई क्लोनिंग तकनीक के जरिये 'गरिमा' नामक भैंस की क्लोन पैदा की गई।

देश में आईसीएआर द्वारा जहां साल के दौरान धान की सूखे और जलमग्नता सहनशीलता बढ़ाने वाले नयी किस्मों को विकसित किया गया, वहीं अनाज को तमाम रोगों से बचाने के लिए इनकी प्रतिरोधी किस्मों के विकास की ओर ध्यान दिया गया। कृषि मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि विभिन्न कृषि जलवायु दशाओं में खेती के लिए प्रमुख फसलों की 147 नयी और उन्नत किस्में विकसित की गईं।


इसी दौरान गेहूं के उत्पादन पर मंडराते वैश्विक खतरे, तना रतुआ, यूजी 99 जैसे पादप रोगों से फसल को बचाने के लिए डीबीडब्ल्यू 17, पीबीडब्ल्यू 550, लोक 1 और तुर्जा जैसी प्रतिरोधी किस्मों की पहचान की गई। बढ़ती आबादी के बीच जलवायु परिवर्तन, उत्पादकता में ठहराव, नये रोग इत्यादि जैसी नयी चुनौतियों से निपटने की दिशा में भारत के प्रमुख कृषि शोध संस्थान आईसीएआर ने वर्ष 2009 में फसल बीजों की नयी अधिक रोग प्रतिस्पर्धी, बेहतर उत्पादकता वाली किस्मों पर शोध कर उम्मीद की नयी किरण जगायी।

जलवायु की अनिश्चितता और उत्पादकता स्तर को बढ़ाने के प्रयास के तहत इस प्रमुख शोध संस्थान की ओर से कई उपाय किये गये। इन उपायों में सूखे और बाढ़ से फसल को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए सहभागी धान नामक धान की सूखा और स्वर्ण सब वन जलमग्नता सहनशील नयी किस्मों का विकास किया गया।

इस दौरान आलू से फ्रेंच फ्राइज बनाने के लिए इसकी अधिक सूखे अंश वाली किस्म कुफरी फ्राइसोना भी विकसित की गई। उन्नत बीजों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए आईसीएआर ने 7,340 टन प्रजनक बीजों और 25 लाख से अधिक रोपण सामग्रियों का उत्पादन और वितरण किया। आईसीएआर ने मिट्टी में पोषक तत्व जिंक की कमी को दूर करने के लिए जिंक को घोलने वाला बैक्टेरियल जीव उवर्रक विकसित किया। वर्ष के दौरान बर्ड फ्लू के निदान के लिए भोपाल स्थित उच्च सुरक्षा पशु रोग प्रयोगशाला को ओआईई का अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला।

कृषि शोध को बढ़ावा देने के प्रयास के तहत भारत और विदेश में डाक्टरेट के लिए अंतरराष्ट्रीय स्कारलरशिप प्रारंभ करने के साथ साथ स्नात्कोत्तर स्तर के 95 विषयों और डाक्टरेट के 80 विषयों के संशोधित पाठयक्रम और पाठय विवरण लागू किये गये। इन सबके अलावा वर्ष के दौरान वैज्ञानिक मानव संसाधन के सशक्तीकरण के लिए 773 रिक्त वैज्ञानिक पदों पर भर्ती और नियुक्ति की प्रक्रिया सम्पन्न की गई। इसके साथ ही बीज की 30 प्रतिशत बचत करने वाला ट्रैक्टर आरोपित जीरा बुवाई यंत्र का विकास किया गया।

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