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मेघालय ने 36 वर्ष के इतिहास में देखी 20 सरकारें

मेघालय में राजनीतिक अस्थिरता कोई नई बात नहीं है। 1972 में राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से यहां राजनीतिक उथलपुथल चलती रही है और 2009 भी इससे कुछ अछूता नहीं रहा। मार्च में राकांपा के नेतृत्व वाली सरकार का गिरना मेघालय के इस चरित्र में एक और पन्ना जोड़ गया। राज्य में राकांपा नेतृत्व वाला मेघालय प्रोग्रेसिव अलायंस सत्ता में एक वर्ष पूरा करने के तीन दिन पहले ढह गया। राज्य के 36 वर्ष के इतिहास में यह 20वीं सरकार थी।

सरकार में उठापटक तो फरवरी के मध्य में ही शुरू हो गई थी, जब विपक्षी कांग्रेस का समर्थन कर रहे निर्दलीय विधायको में से एक ने पाला बदल लिया। एक उपचुनाव जीतकर विधानसभा में अपने सदस्यों की संख्या बढ़ने से उत्साहित कांग्रेस को उस समय बड़ी सफलता मिली, जब सत्तारूढ़ गठबंधन का समर्थन करने वाले दो निर्दलीय विधायकों और क्षेत्रीय पार्टी केएचएनएएम के एकमात्र विधायक ने सत्तारूढ़ गठबंधन का दामन छोड़कर कांग्रेस को हाथ थाम लिया। उसके बाद जोरदार राजनीतिक नाटकबाजी हुई और एक अन्य क्षेत्रीय पार्टी के विधायक ने केबिनेट से इस्तीफा दे दिया और वह उप सभापति सनबोर शुलाई के साथ लापता हो गए।

राकांपा सरकार को 17 मार्च को सदन पर शक्ति परीक्षण के लिए उतरना पड़ा, लेकिन वह जैसे जैसे अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही। अंततः 26 मार्च को केन्द्र ने संवैधानिक संकट की बात कहकर राज्य को राष्ट्रपति शासन के आधीन कर दिया। इसके बाद भी राज्य में चलने वाले राजनीतिक घटनाक्रम की नाटकीयता कम नहीं हुई। आए दिन तरह तरह के राजनीतिक समीकरण उभरने लगे। कांग्रेस ने पहले तो राकांपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया, लेकिन बाद में क्षेत्रीय युनाइटिड डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने की बात कही।

वेंकटेश ने कहा कि जुआरियों की जिंदगी पर आधारित फिल्मों में ताश के पत्तों के जरिये जीवन के अनेक स्याह पहलुओं को सामने रखने में कामयाबी मिली थी। दुनिया के कई देशों में 27 दिसम्बर को प्लेयिंग कार्डस डे मनाया जाता है। हालांकि इसके इतिहास के बारे में ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्होंनें कहा कि वैसे तो ताश को बहुत अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता है लेकिन सचाई यह भी है कि इनमें जीवन का एक दर्शन भी छुपा हुआ है। गौर से देखा जाए तो ताश के पत्ते जिंदगी की विडबनाओं और जोड़-घटाव को भी दर्शाते हैं। वे एक अलग ढंग से बताते और जताते हैं कि जीवन में किसी को सबकुछ नहीं मिलता और किस्मत हर किसी पर मेहरबान नहीं होती।

उन्होंने वर्ष 1961 में स्टेफन ज्वीग के उपन्यास पर आधारित फिल्म टवेंटी फोर आवर्स इन ए वूमेंस लाइफ का जिक्र करते हुए कहा कि इन्ग्रिड बर्गमैन और रिप टॉर्न अभिनीत उस फिल्म में एक महिला ताश के पत्तों में अपनी किस्मत ढूंढ रहे व्यक्ति को सुधारने की कोशिश करती है लेकिन वक्त उसका साथ नहीं देता। एक बार उसके जहन में यह बात उठती है कि किस्मत के पत्ते उसका साथ नहीं दे रहे हैं। सच है कि बाजीगरों के हाथ में पड़कर किस्मत बदलने वाले और भविष्यवक्ता के हाथों में जाकर किस्मत की बनी-बिगड़ी बताने वाले ताश के पत्तों के फलसफे का जिंदगी से गहरा नाता है।

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