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अमेरिका तक पहुंचा लेबर कॉलोनी के पापड़ का स्वाद

गरीबी ने परिवार के सामने जब दो जून की रोटी का संकट खड़ा किया तो घर की महिलाओं ने कमान संभाल ली। पैसा नहीं था सो कोई व्यापार भी नहीं कर सकते थे। मोहल्ले की काकी को पापड़ बनाते देखा था। कई बार पापड़ का आटा गूंथने में उनकी मदद भी की। बस फिर क्या था, घर में ही पापड़ बनाना शुरू कर दिया। अब शहर की लेबर कॉलोनी के दो घरों के पापड़ों का स्वाद शहर के सैकड़ों परिवार ही नहीं ले रहे। उनकी रिश्तेदारियों में पाकिस्तान और अमेरिका सहित कई देशों तक इन पापड़ों की महक पहुंच चुकी है।


लेबर कॉलोनी के मकान नंबर-  में रहती हैं मोहिनी भागवानी। पति को सांस की बीमारी ने घेर लिया तो मानो परिवार पर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। मोहिनी ने हार नहीं मानी। घर में ही शुरू हो गया पापड़ का व्यवसाय। दाल, चावल और गेंहू के आटे के कई प्रकार के पापड़ बनाने शुरू कर दिए। अब दिक्कत थी कि तैयार होने वाले पापड़ों की बिक्री कैसे की जाए। शुरुआत में कुछ घरों में संपर्क किया गया। धीरे-धीरे ग्राहक बनने का सिलसिला शुरू हो गया। और इसी के साथ खत्म हो गया पापड़ों की बिक्री का संकट। अब मोहिनी को पापड़ कहीं बेचने जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। शहर की सैकड़ों महिलाएं उनके घर से ही पापड़ ले जाती हैं। इस काम में मोहिनी की मदद उनकी दोनों बेटियां सीमा और प्रियंका करती ही हैं, बेटा सोनू भी पापड़ सुखाने में पूरा हाथ बंटाता है। मोहिनी बताती हैं कि पापड़ों की बेहद डिमांड रहती है। कई ऐसे लोग हैं जो इन्हें पाकिस्तान, अमेरिका सहित कई अन्य स्थानों पर रहने वाले अपने रिश्तेदारों को भी भिजवाते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी पड़ौस में रहने वाली कमला की है। कमला के पति कॉलोनी में ही छोटी सी दुकान चलाते हैं, पर उससे घर का खर्च भी नहीं जुट पाता। कमला ने करीब पांच साल पहले घर में ही पापड़ बनाने का काम शुरू किया। अब वे हर रोज दो से तीन किलो पापड़ बनाती हैं। कमला कहती हैं कि पापड़ घर से ही बिक जाते हैं। हम लोग उतना ही माल बनाते हैं जितना बिक जाए। इसके अलावा आर्डर पर भी माल तैयार किया जाता है। कुछ लोग एडवांस पैसा भी दे जाते हैं।

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