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रग-रग निखरे राग से

सदा गाते-गुनगुनाते रहिए। गाना नहीं आता, तो बाथरूम सिंगर ही बनिए। गुनगुनाना खिलखिला कर हंसने के बराबर है। शरीर की तमाम मांस पेशियां खुलती हैं। तनाव दूर होता है। गजल फनकार जगजीत सिंह का कहना है, ‘गीत-संगीत की ताल इंसान को ऐसी अलग-थलग दुनिया में तैराने लगता है, जहां भीतर धैर्य और निश्चलता का अहसास जागता है। गाने से दिमागी संतुलन रहता है और अस्थिर दिमाग को शांति मिलती है। अस्थिर दिमाग तो सदा कुछ न कुछ सोचता और किसी न किसी चिंता में डूबा रहता है। गाने से मुझे असीम आनंद, प्यार, रोमांच, शांति और उभार मिलता है।’
    
गाने-गुनगुनाने से इंसान के भीतर ऊर्जा का संचार होता हे। रग-रग रोम-राम पुलकित हो कर नाच उठता है। खामोशी और उदासी जीवन के मायने ही भंग कर देती है। जिंदगी खूबसूरत है, प्यारी है, जीने लायक है। गंभीरता आत्मा की बीमारी है। गंभीर व्यक्ति न गाते हैं, न नाचते हैं, न हंसते हैं। इंसान खुद की कैद में फंस जाता है। दिमागी बोझ हटेगा, तो मन गा उठेगा। तय है कि इंसान तृप्त होगा, मस्त होगा, तभी गाएगा। इंसान का गीत-संगीत से गहरा नाता है।

गीत-संगीत गा या सुन कर उदास मन भी खुश हो जाता हे। इसीलिए संगीत को चिकित्सा के तौर पर इस्तेमाल की भी पहल हुई है। डॉक्टर तक गीत-संगीत से सेहत के फायदों को मानते हैं और रग-रग निखरे राग के गुण को स्वीकार करते हैं। इसीलिए ईश्वर की पूजा-अराधना में मंत्रों और आरतियों की भूमिका सदियों पुरानी है। स्कूली प्रार्थना सभाओं में भी देश भक्ति के गीत गाए जाते हैं। फेंग्थुई भी सुर-ताल पैदा करने वाले वाद्य यंत्रों को अत्यंत उपयोगी मानता है। क्योंकि इनसे जड़ वस्तु में भी चेतना जगाई जा सकती है। रोज सुबह या शाम गाने-गुनगुनाने से अहंकार और स्वार्थ की भावना दूर भागती है और बद्ध संसार से जुड़ते हैं। गीत गाने से प्यार, खुशी और कृतज्ञता पनपती है। जब-जब दिल से गाएंगे, अहंकार खुद-ब-खुद गायब हो जाएगा। अहंकार भगाने का हंसने-गाने से बेहतर तरीका कोई नहीं है।

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