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नक्सलियों का भी होता है तबादला!

नक्सलियों के भी तबादले होते हैं! फर्क सिर्फ इतना होता है कि नई जिम्मेदारी के साथ उनके नाम बदल जाते हैं। नक्सल गतिविधियों की यह एक बड़ी सच्चाई है। रेड कोरिडोर बनाने की राह पर निकले नक्सली अपनी गतिविधियों को सटीकता से अंजाम देने की खातिर कई तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। इसमें नक्सलियों का एक जोन से दूसरी जोन में तबादला और नाम बदला जाना उनके ऑपरेशन का खास हिस्सा है। इसमें पूरी गोपनीयता बरती जाती है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई नक्सलियों के परिवार के लोगों को भी बदले गए नाम की जानकारी नहीं होती।


सूत्रों के अनुसार हार्डकोर नक्सलियों को जब एक जगह से दूसरे जगह भेजा जाता है तो उनका नाम भी बदल दिया जाता है। यहीं से शुरू होता है उनके नाम के पीछे ‘उर्फ’ जुड़ने का सिलसिला। जितने तबादले उतने नए नाम और हर नाम के पीछे जुड़ जाता है एक ‘उर्फ’। इसके कई उदाहरण भी हैं। हार्डकोर माओवादी अजय कानू उर्फ सूरज उर्फ रवि, देव कुमार उर्फ अरविन्द जी, लालबाबू सहनी उर्फ भाष्कर जी उर्फ अनिल कुमार। आमतौर पर जितने भी हार्डकोर नक्सली हैं उतने ही उनके नाम हैं। पुलिस और खुफिया तंत्र की नजर में उनकी पहचान छिपाने के लिए संगठन की ओर से हार्डकोर सदस्यों को नया नाम दिया जाता है।


सूत्रों की मानें तो तबादले और जोन निर्धारण के पहले संगठन की ओर से उनके परफार्मेस का भी आकलन किया जाता है। इसके बाद उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें नई जिम्मेवारी सौंपी जाती है। इसके अलावा किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के लिए उन्हें प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है। सूत्रों की मानें तो बड़े ऑपरेशन के लिए माओवादियों को हैदराबाद में प्रशिक्षित किया जाता है। उनकी ट्रेनिंग भी खास होती है। निशानेबाजी से लेकर अत्याधुनिक विस्फोटकों को ऑपरेट करने की खास ट्रेनिंग दी जाती है। हैदराबाद के नक्सली कैंप में स्पेशल ट्रेनिंग ले चुके उत्तर बिहार कमेटी के सचिव लालबाबू सहनी और धनंजय कुमार को एसटीएफ ने कई महीने पहले पटना में ही गिरफ्तार किया था।

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