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व्यसन की कीमत

कैंसर के इलाज में बहुत तरक्की हुई है लेकिन अब भी कैंसर का इलाज मुश्किल है और यह घातक बीमारी बनी हुई है। कैंसर न हो इसके लिए भी कुछ कारकों से बचने की सलाह दी जाती है लेकिन यह बीमारी किन-किन कारणों से होती है यह बता पाना मुश्किल है। इसलिए यह विचित्र लगता है कि भारत में सबसे ज्यादा मुंह का कैंसर होता है, क्योंकि मुंह का कैंसर एक ऐसा कैंसर है जिसके कारणों का काफी हद तक ठीक-ठीक पता है। 

मुंह के कैंसर के 85 प्रतिशत मामले ऐसे लोगों में होते हैं जो तंबाकू, गुटखा या शराब का सेवन करते हैं यानी इन चीजों से बचा जाए तो मुंह के कैंसर में लगभग 85 प्रतिशत की कमी आ जाएगी। इसका एक खतरनाक पक्ष यह भी है कि इन दिनों मुंह के कैंसर के लगभग 20 प्रतिशत मरीज तीस से कम उम्र के हैं। मुंह के कैंसर के इलाज में समस्या यह है कि अक्सर इसके इलाज से कोई स्थायी विकृति रह जाती है, मसलन कई लोगों की जीभ काटकर निकालनी पड़ती है या मुंह की अंदरूनी त्वचा पर ऐसे घाव बन जाते हैं जिनकी वजह से बोलना, खाना-पीना मुश्किल हो जाता है।

यहां फिर से रेखांकित करने वाला तथ्य यह है कि खतरनाक व्यसन अगर छोड़ दिए जाएं तो इस कैंसर से बचा जा सकता है। हमारे देश में अक्सर लोग किशोरावस्था में तंबाकू खाना शुरू कर देते हैं। धूम्रपान को लेकर जितनी पाबंदियां हैं उतनी तंबाकू खाने को लेकर नहीं हैं, शायद इसलिए भी धूम्रपान विरोधी मुहीम के चलते नौजवान खाने वाली तंबाकू की ओर आकर्षित हो रहे हैं और छोटी उम्र में कैंसर के शिकार हो रहे हैं। जिन गुटखों में तंबाकू नहीं होती वे भी ज्यादा सुरक्षित नहीं होते क्योंकि उनमें भी सस्ते और नुकसानदेह रसायन होते हैं।

तंबाकू या दूसरे तेज रसायन मुंह के अंदर की कोमल त्वचा पर लगातार प्रहार करते रहते हैं और धीरे-धीरे घाव बनाते रहते हैं, इससे त्वचा की कोशिकाएं असामान्य होती जाती हैं और अक्सर कैंसरयुक्त हो जाती हैं। अल्कोहल भी एक तेज रसायन है और इसका भी ज्यादा उपयोग मुंह की त्वचा के लिए खतरनाक हो सकता है। धूम्रपान के खिलाफ तो माहौल बन रहा है लेकिन इन रसायनों को लेकर सरकारी स्तर पर भी काफी लापरवाही है और समाज में भी विशेष सजगता नहीं है। जाहिर है कि स्वास्थ्य संबंधी सारी चीजों पर अपना बस नहीं है लेकिन जिन चीजों पर हमारा बस है, कम से कम वे तो की जा सकती हैं और जिन चीजों से बचा जा सकता है, उनसे तो बच सकते हैं।

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