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तमिलनाडु : विभाजन की आग यहां भी

तमिलनाडु की दो ताजा घटनाओं में राजनेताओं के लिए चेतावनी भरे संदेश छिपे हैं। संदेश यह है कि लोग राजनैतिक नेतृत्व और उसके प्रशासन से तंग आ चुके हैं। इन दोनों घटनाओं का अलग-अलग वजहों से महत्व है। पीएमके नेता एस रामदास ने पिछले दिनों राज्य के विभाजन की मांग कई बार दोहराई है। इस बात का व्यापक राजनैतिक महत्व है। इस मांग से दो बातें हुईं।

पहली डीएमके नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने पड़ोसी आंध्र प्रदेश में चल रहे तेलांगाना आंदोलन का तीखा विरोध किया है। उनकी इस प्रतिक्रिया को मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक का पूरा-पूरा समर्थन मिला है। इस मुद्दे पर दोनों द्रविड़ पार्टियों में  सहमति हालांकि राजनैतिक स्तर पर अच्छी लगती है, लेकिन आम आदमी इसे अविश्वास की निगाह से ही देखता है। राज्य की पान और कॉफी की दुकानों पर जो सवाल उठाया जा रहा है वह यह है कि ऐसी औपचारिकता की जरूरत क्या है, जब अनौपचारिक स्तर पर यह शांतिपूर्वक हो गया है?

लोगों का गुस्सा और संदेह इस सवाल में व्यक्त होता है और इसका जवाब मुख्यमंत्री के लिए ज्यादा खतरनाक है। गपशप के मुताबिक राज्य को कानिनाडु, गिरिनाडु और स्टालिननाडु में पहले ही बांटा जा चुका है और करुणानिधि के तीन राजनैतिक वारिसों बेटी कानीमौजी, बेटे अलागिरि और स्टालिन को सौंपा जा चुका है। अगर राजनेता इसे सिर्फ एक राजनैतिक मजाक मानकर किनारे कर देते हैं तो वे अपने को सुधारने का एक मौका खो देते हैं। क्योंकि इस मजाक में हमारे लोकतंत्र के भाई-भतीजावाद पर तीखी टिप्पणी है। इससे लोगों का अविश्वास भी समझ में आता है जिन्होंने द्रमुक को शुरूआती ‘पार्टी एक परिवार है’ रवैये से मौजूदा ‘परिवार ही पार्टी है’ वाले रवैये पर आते देखा है।

जो दूसरी घटना तमिलनाडु में चर्चा में है वह एक शिक्षा संस्थान में कैपिटेशन फीस की मांग को लेकर है। यह शिक्षा संस्थान केन्द्र में सूचना प्रसारण राज्य मंत्री एस. जगतरक्षकन का है। यह मुद्दा तब प्रकाश में आया जब एक अखबार और टेलीविजन चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाया। इसमें मेडिकल कालेज के एक प्रशासनिक अधिकारी कह रहे हैं कि ‘मंत्री जी ने हमें कहा है कि 20 लाख रु. से कम नहीं लिए जाएं’ राज्य सरकार ने यह दावा किया था कि उसने निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में कैपिटेशन फीस के खिलाफ एक सिस्टम बना दिया है। इसके एक हफ्ते के अंदर ही यह स्टिंग आपरेशन हुआ। इससे राज्य में थोड़ी हलचल तो हुई लेकिन कोई बड़ा असंतोष नहीं दिखाई दिया।

ऐसा इसलिए है कि सभी जानते हैं कि जगत रक्षकन की राजनीति में हैसियत उनके पैसे की वजह से ही है और यह सारा पैसा उनके शिक्षा संस्थानों से आता है। दरअसल जगत रक्षकन उन शुरुआती लोगों में से थे जिन्होंने निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों का रिवाज तमिलनाडु में शुरू किया। उन्होंने और उनके कुछ मित्रों ने पड़ोसी आंध्र और कर्नाटक से प्रेरणा ली, जहां निजी शिक्षण संस्थान चलाना अनौपचारिक रूप से उद्योग के स्तर पर पहुंच गया है।

अस्सी के दशक में जब एम जी रामचन्द्रन मुख्यमंत्री थे तब जगत रक्षकन ने शुरुआत की और लगातार तरक्की की। शुरू में जो एक मेडिकल कालेज उन्होंने खोला वह उनके लिए टकसाल साबित हुआ और उसके सहारे उन्होंने कई निजी शिक्षा संस्थान खोल दिए। इनके क्षेत्र अलग-अलग थे और उस वक्त उस पेशे की लोगों में लोकप्रियता पर आधारित थे। इन संस्थानों से मिले पैसे से वे होटल, जमीन और मीडिया जैसे धंधों में उतरे। इस रास्ते वे राजनीति में भी आए। उन्होंने द्रमुक की सदस्यता ली और सांसद बन गए। सिर्फ एक सांसद होते हुए भी उनका राजनैतिक वजन इतना ज्यादा था कि उन्होंने अपने शिक्षा उद्योग ‘भारत इंस्टीट्यूट आफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च’ (बिहेर) के लिए डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा पा लिया। उस वक्त केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व में राजग की सरकार थी।

जो भी हो मंत्री जी के इस मामले में फंसने की संभावना बहुत कम है। इसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि जगतरक्षकन की राजनैतिक पहुंच तमाम पार्टियों में है। इसी की वजह से राजग की सरकार के दौरान भी उन्होंने डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल कर लिया था। तब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यह शर्त रखी थी कि इन संस्थानों में स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रमों को बेहतर बनाया जाएगा। दूसरी बात यह है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने से पहले जगतरक्षकन ने सारे शिक्षा संस्थानों के सारे पदों से इस्तीफा दे दिया था। इस सावधानी की वजह से वे किसी भी कानूनी पेच में फंसने से बच जाएंगे।
                         
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

radhaviswanath73@yahoo.com

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