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मियां की जूती

दलबदल अब वैसा चर्चित विषय नहीं रह गया है, जैसा कभी भजनलाल के जमाने में होता था। हालांकि हर छोटे-मोटे चुनाव के बाद दलबदल तो होता ही है। घोड़ों की मंडी सजती ही है। इधर झारखंड में भी यह परंपरा काफी पुरानी है। भजनलाल का नाम यहां भी नया नहीं है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के जिन सांसदों की खरीद-फरोख्त का मामला एक जमाने में इतना चर्चित रहा था, उसमें बताते हैं कि उनकी भूमिका निर्णायक रही थी।

दरअसल तब दलबदल भजनलाल का और भजनलाल दलबदल का पर्याय हो गए थे। उन्होंने इसे क्लासिक दर्जा दिया। हरियाणा में भजनलाल की पार्टी, जिसे उनके पुत्र ही चलाते हैं, पूरी की पूरी कांग्रेस में चली गयी। पिछली बार उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया था तो वे और उनके तत्कालीन सांसद पुत्र कांग्रेस से अलग हो गए थे। हालांकि अपना राजनीतिक कौशल दिखाते हुए उन्होंने अपने बड़े पुत्र चंद्रमोहन को कांग्रेस में ही रहने दिया, क्योंकि वे उप-मुख्यमंत्री थे। बाद में इश्क के चक्कर में वे न सिर्फ चांद मोहम्मद हुए, घर और राजनीति से दर-बदर भी हुए। जो भी हो, पिछले दिनों हरियाणा में हुए चुनाव में भजनलाल की पार्टी उनके पुत्र के नेतृत्व में पूरे जोर-शोर उतरी थी।

विधायक तो ज्यादा नहीं आए। लेकिन जिस तरह के चुनाव परिणाम आए, उससे उनकी सौदेबाजी की ताकत काफी बढ़ गयी थी। मुख्यमंत्री तो नहीं, लेकिन उप-मुख्यमंत्री का पद उन्हें मिलने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन आखिर में उन्हें मिला कुछ भी नहीं। पूरी पार्टी कांग्रेस में चली गयी और वे अकेले रह गए। कभी भजनलाल इसी तरह अपने सारे विधायकों को लेकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। उस समय वे मुख्यमंत्री थे और जनता पार्टी से थे। लेकिन फिर केंद्र में इंदिरा गांधी के फिर से सत्ता में आते ही, वे अपने सारे विधायकों को लेकर कांग्रेस में चले गए। तो जिस हरियाणा को आयाराम-गयाराम की राजनीति के नाम से जाना जाता था, उस राजनीति को उन्होंने उत्कर्ष पर पंहुचा दिया था।

भजनलाल बदबदल पर कभी शर्मिदा नहीं हुए। बल्कि उसे उन्होंने अपना यूएसपी बनाया। उस जमाने में हरियाणा में यह कहा जाता था कि पार्टी कोई भी जीते, सरकार तो भजनलाल की ही बनेगी। उनके लिए दलबदल की अनैतिकता इलीट राजनीति का शगल था और इसका मुकाबला उन्होंने दलबदल को क्लासिक रूप देकर किया। वे छाती ठोंककर कहते थे कि दलबदल में मैं पीएचडी हूं। अब बदले हालात में उनकी पीएचडी धरी रह गयी और कांग्रेसवाले उनके सारे विधायक उड़ा ले गए। यानी मियां की जूती, मियां के सिर।

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