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पुलिस और नक्सली दोनों टेक्नोलॉजी की शरण में

 नक्सली और पुलिस एक दूसरे को मात देने के लिए अब टेक्नोलॉजी का सहारा ले रहे हैं। नक्सलियों के गढ़ के सही लोकेशन के लिए राज्य पुलिस ने अब ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम(जीपीएस) का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। वहीं सही ठिकाने और निशाने तक पहुंचने के लिए नक्सली भी अत्याधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं।


पुलिस और नक्सलियों के बीच जारी इस जंग में टेक्नोलॉजी वार का नया अध्याय भी जुड़ गया है। जानकारी के अनुसार मारक हथियारों से लैस नक्सली अब सरकारी नक्शे के साथ-साथ मैग्नेटिक कम्पास और लेजर प्वाइंटर तक का इस्तेमाल कर रहे हैं। मैग्नेटिक कम्पास का इस्तेमाल रात में सही दिशा की जानकारी के लिए किया जाता है। वहीं लेजर प्वाइंटर का प्रयोग पोजिशन बताने के लिए किया जाता है। पुलिस को इसकी भनक तब लगी जब बीते दिनों डेहरी में ये उपकरण जब्त किए गए। वहां एसटीएफ ने राजू उर्फ मानदेव के ठिकाने से भारी मात्र में असलहों के साथ इन उपकरणों को जब्त किया था। यह पुलिस के लिए चौंकाने वाली घटना थी। संदेश साफ था कि पुलिस अगर डाल-डाल चल रही है तो नक्सली पात-पात।


दूसरी ओर उन हार्डकोर नक्सल इलाकों में जहां पुलिस का पहुंचना मुश्किल माना जाता रहा है, तक पहुंचने के लिए पुलिस ने जीपीएस सिस्टम का प्रयोग शुरू किया है। पिछले दिनों मुंगेर में कांबिंग ऑपरेशन के दौरान इसी सिस्टम का सहारा लिया गया था और उस इलाके के पूरे लोकेशन पर पुलिस ने वर्कआउट किया। इस आधार पर राज्य पुलिस नक्सलियों के कैंप और जमावड़े वाले इलाकों तक पहुंचने की योजना पर काम कर रही है ताकि भविष्य में भी पुलिस को अगर ऑपरेशन करना पड़े तो पहुंचने में परेशानी न हो। एक अधिकारी की मानें तो जीपीएस का इस्तेमाल कांबिंग के दौरान अलग-अलग दिशाओं से आ रही फोर्स को एक निर्धारित स्थान तक पहुंचाने में भी हो रहा है। रात में खासकर जंगल-झाड़ वाले इलाकों में ऑपरेशन के दौरान जवानों के भटकने का खतरा रहता है।
वहीं दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि नक्सली अपने गोला-बारूद और असलहों को सटीक ठिकाने तक पहुंचाने के लिए इन उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इतना ही नहीं इन उपकरणों के साथ वे बाकायदा कई राज्यों के सर्वे ऑफ इंडिया के मैप का भी सहारा ले रहे हैं।

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