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चिकित्सा के क्षेत्र में हुए कई चमत्कार

देश में चिकित्सा के क्षेत्र में बीते वर्ष कई उपलब्धियां हासिल हुईं। इनमें से कुछ तो ऐसी रहीं जिन्हें चमत्कार कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा।

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इस साल चिकित्सकों ने थाइमस ग्रंथि के ट्यूमर से पीड़ित 26 साल के एक युवक का दुर्लभ आपरेशन कर फेफड़ा, हृदय का हिस्सा और रक्त वाहिनियां हटाईं।

इस युवक में थाइमस ग्रंथि का ट्यूमर दाहिने फेफड़े, हृदय और उसकी रक्षात्मक झिल्ली तथा हृदय से फेफड़े तक रक्त ले जाने वाली महत्वपूर्ण सुपीरियर वेना कैवा धमनी तक फैल गया था।

रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी के जरिए सभी तरह के ट्यूमर का इलाज करने की कोशिश की जाती है लेकिन थाइमस ग्रंथि के ट्यूमर के इलाज में इसका उपयोग विवाद का विषय है। हृदय तक इसके फैले होने की वजह से इसका इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

एम्स में कार्डियोथोरैसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डा़ शिव कुमार ने बताया, यद्यपि इस ट्यूमर का इलाज आपरेशन के जरिए ही संभव है लेकिन भारत में थाइमस ग्रंथि के ट्यूमर का आपरेशन चिकित्सक समुदाय के बीच अछूता क्षेत्र रहा था।

एम्स में ही एक्टोपिया कोर्डिस से पीड़ित एक बच्चे का जटिल आपरेशन किया गया लेकिन अपनी तरह के विरले मामले में सीने के बाहर धड़कते दिल के साथ पैदा हुए शिशु की मौत हो गई।

एक्टोपिया कोर्डिस बीमारी में दिल अपने सामान्य स्थान पर नहीं होता। 22 दिन के इस बच्चे का दिल भी सीने के बाहर धड़क रहा था। तीन सितंबर को डाक्टरों ने जटिल आपरेशन के बाद बच्चे के सीने में उसके दिल के लिए जगह बनाई और दिल को सफलतापूर्वक उसके स्थान पर रख दिया। बच्चे को आईसीयू में रखा गया था और उसकी हालत स्थिर लेकिन नाजुक थी।

26 अगस्त को पैदा हुए इस बच्चे को बिहार में रहने वाले उसके पिता चंदर माझी एक तौलिए में लपेटकर अस्पताल लाए थे। 16 सितंबर को उसकी मौत हो गई।

एक्टोपिया कोर्डिस एक ऐसी बीमारी है, जो प्रति दस लाख बच्चों में से पांच से नौ बच्चों को होती है और इससे पीड़ित बच्चे की मत्यु दर बहुत अधिक होती है।

एम्स के चिकित्सकों ने 22 सितंबर को अपने तरह की पहली सर्जरी में 11 वर्षीय एक बालक को नया जीवन देने के लिए एक अन्य व्यक्ति की, सर्जरी के बाद बचीं शिराओं का इस्तेमाल किया। राहुल नामक बालक ऐओर्टा आर्टराइटिस बीमारी से पीड़ित था, जिसमें हृदय से अलग अलग अंगों तक खून ले जाने वाली रक्त वाहिनियां सिकुड़ जाती हैं। इससे अंगों में खून की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पाती।

एम्स के कॉर्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ़ शिवकुमार चौधरी ने कहा कि राहुल के मामले में गुर्दे को रक्त की आपूर्ति करने वाली धमनी के सिकुड़ने के कारण कम रक्त पहुंच पा रहा था। इस तरह की बीमारी में गुर्दे के निष्क्रिय होने का खतरा होता है।

राहुल के पैरों की नसों से सामान्य संपर्क नहीं होने की वजह से पैरों में भी रक्त आपूर्ति सीमित हो पा रही थी। संयोग से हदय की बाइपास सर्जरी के लिए एक रोगी अस्पताल में आया, जिसकी सर्जरी में दरअसल पैर की एक नस का इस्तेमाल होना था। ऑपरेशन के बाद उस नस का कुछ हिस्सा बच गया जिसे फेंका जाना था लेकिन डॉक्टरों ने इसे राहुल के उपचार में कारगर समझा और उसका उपयोग कर लिया। राहुल के लिए अच्छी बात यह थी कि उसके शरीर के मानदंड बाइपास कराने वाले रोगी के मानदंडों से मिलते थे।

मुंबई के एक अस्पताल में रोगी के शरीर में से पथरी सहित पित्ताशय को निकालने के लिए एक नई कॉस्मेटिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया। हिंदुजा अस्पताल के सर्जन दीपराज भंडारकर ने बताया तकनीक को सिल्स पोर्ट के नाम से जाना जाता है, जो अमेरिका की एफडीए द्वारा स्वीकृत तकनीक है। सितंबर माह में इसकी भारत में शुरुआत की गयी।

भंडारकर ने कहा कि इस सिंगल इनसिजन लैप्रोस्कोपिक सर्जरी (सिल्स) में रोगी की नाभि के नीचे डेढ़ से दो सेंटीमीटर लंबा चीरा लगाकर इसमें से लैप्रोस्कोप और अन्य उपकरण प्रविष्ट कराये जाते हैं।

हैदराबाद से 300 किलोमीटर दूर विजयवाड़ा के एक सरकारी अस्पताल के शिशु वार्ड में इन्क्यूबेटरों में रखे पांच नवजातों की 15 नवंबर को संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी।

चिकित्सकीय लापरवाही की एक त्रासद घटना में 31 जनवरी को पटियाला के सरकारी राजिन्दर अस्पताल में शार्ट सर्किट होने की वजह से, इन्क्यूबेटरों में रखे छह नवजात शिशुओं की जल कर मौत हो गई और पांच गंभीर रूप से घायल हो गए।

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