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अमेरिका से नजदीकी पर रूठे रूस को मनाया भारत ने

2009 भारत और रूस दोनो के लिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि दोनों देश अपनी गलतफहमियां दूर कर संबंधों में गरमाहट लाए और बदलती वैश्विक पृष्ठभूमि में द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम दिया।

दोनों देशों ने एक बार फिर रक्षा के क्षेत्र में सहयोग के लिए एक-दूसरे की ओर हाथ बढ़ाया। पश्चिमी देश खास कर अमेरिका भारत के अरबों डॉलर के शस्त्र बाजार में प्रवेश की बहुत कोशिश कर रहा है। बहरहाल नई दिल्ली और मास्को की आपसी समझ-बूझ के चलते इसी माह रूस से परमाणु रिएक्टर खरीदने के लिए सौदा हो गया।

सितंबर में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और दिसंबर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रूस के दौरे पर गए। नई दिल्ली के अमेरिका की ओर झुकाव के कारण भारत और रूस के संबंधों में आई ठंडक प्रतिभा पाटिल और मनमोहन सिंह के दौरे से काफी हद तक दूर हुई।
   
दीर्घकालिक भारत-रूस सैन्य प्रौद्योगिकी सहयोग कार्यक्रम के वर्ष 2020 तक विस्तार के लिए सिंह की मास्को यात्रा के दौरान एक असैन्य परमाणु समझौते पर और अंतर सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों की मानें तो ऐसा करके नई दिल्ली ने यह राजनीतिक संकेत दिया कि मास्को पहले की तरह आगे भी उसका प्रमुख रणनीतिक साझीदार बना रहेगा।

इससे पहले सिंह नवंबर 2007 में सालाना द्विपक्षीय सम्मेलन के लिए मास्को गए थे। वह तत्कालीन राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कार्यकाल का अंतिम दौर था। तब विमानवाहक पोत गोर्शकोव के सौदे को लेकर हुए विवाद से दोनों देशों के संबंधों में ठहराव सा आ गया था।

दिसंबर 2008 में राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव भारत के पहले आधिकारिक दौरे पर गए। लेकिन रूसी आर्थोडॉक्स चर्च के प्रमुख के निधन की वजह से उन्हें एक दिन पहले लौटना पड़ा। मेदवेदेव बुश प्रशासन के दौरान हस्ताक्षरित परमाणु समझौते के संदर्भ में वाशिंगटन की ओर नई दिल्ली के झुकाव के बारे में मास्को का संदेह दूर नहीं कर पाए।
   
वर्ष 2008 में ईयर ऑफ रशिया इन इंडिया मनाया गया। इसकी सफलता के बाद 2009 में ईयर ऑफ इंडिया इन रशिया मनाया गया। दोनों देशों में सांस्कृतिक महोत्सवों का आयोजन पूर्ववर्ती राष्ट्रपति पुतिन की पहल पर हुआ ताकि दोनों देश एक दूसरे के करीब आ सकें।
   
संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जून में पहले विदेशी दौरे पर रूस गए जहां उन्हें बीआरआईसी के सम्मेलन में और येकतेरिनबर्ग में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन में भाग लेना था। इस दौरे ने संकेत दिया कि भारत रूस के साथ अपने संबंधों को बहुत महत्व देता है।

सितंबर के शुरू में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल मास्को गईं और दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में गलतफहमी के कारण आई ठंडक दूर हुई। रूसी दौरे पर प्रतिभा क्रेमलिन को इस बारे में आश्वस्त करने में सफल रहीं कि अमेरिका के साथ भारत के संबंधी रूस के साथ रिश्तों की कीमत पर नहीं हैं। उनके बाद वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा, रक्षा मंत्री एके एंटनी और विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी अपने रूसी दौरों में इस संदेश को दोहराया। रूस ने भी भारतीय भावनाओं को समझा।
   
गोर्शकोव विमानवाहक की उन्नयन परियोजना की लागत में वृद्धि, इसकी आपूर्ति में विलंब से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर इसके असर को देखा गया। येकतेरिनबर्ग में सिंह के साथ बातचीत के दो हफ्ते बाद मेदवेदेव सेवेरोदविन्स्क में सेवमैश गोदी गए और गोर्शकोव परियोजना से जुड़े प्रबंधन, नौकरशाहों और मंत्रियों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह भारत-रूस संबंधों में तनाव का एकमात्र कारण बन गया है। आखिरकार गोर्शकोव को लेकर सहमति बन ही गई।

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