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क्या साल-2010 दे पाएगा रुचिका के घरवालों को सुकून

पुलिसकर्मियों की कई करतूतों ने इस वर्ष न सिर्फ उनकी वर्दी को दागदार किया, बल्कि आम जनता में लगातार बिगड़ती उनकी छवि को और चोट पहुंचाई। हत्या से लेकर भ्रष्टाचार और कई तरह की बदकारियों में खाकी वर्दी का जिक्र आया।

साल के अंत में हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर को 19 साल पहले एक किशोरी के यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी करार दिया गया और एक स्थानीय अदालत ने उन्हें छह महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। हालांकि उन्हें इतने संगीन मामले में इतनी कम सजा दिए जाने का चहुं ओर विरोध हो रहा है ।

मीडिया ने इस मामले को गंभीरता से लिया और कहा कि राठौर इतने कम सजा के हकदार नहीं हैं। राठौर ने एक नाबालिक लड़की से छेड़छाड़ की, जिसके कारण उसने आत्महत्या कर ली। ताजा खबरों के मुताबिक यह बात सामने आने लगी है कि राठौर ने कथित रूप से अपने पद का गलत इस्तेमाल किया और केस को कमजोर करने का काम किया। इस मामले में हरियाणा के तात्कालिन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का भी नाम आया। मामले में अहम मोड़ तब आया जब सीबीआई के एक भूतपूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि राठौर ने उन्हें घूस देने की कोशिश की थी।

दरअसल 12 अगस्त 1990 को हरियाणा के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक और हरियाणा लॉन टेनिस संघ के अध्यक्ष राठौर ने 14 वर्षीय टेनिस खिलाड़ी रुचिका का यौन उत्पीड़न किया था। रूचिका ने 28 दिसंबर 1993 में आत्महत्या कर ली थी।

इस मामले की गरमाहट हरियाणा की राजनीति में भी दिखने लगी है जब विभिन्न पार्टियां एक-दूसरे को घेरने के प्रयास में लग गई हैं। जहां ओम प्रकाश चौटाला भजन लाल का नाम इसमें घसीट रहे हैं वहीं कांग्रेस विपक्षी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय लोक दल को घेरने में कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहती है। इन सब कानूनी और राजनीतिक दांवों के बीच क्या रुचिका को इंसाफ मिलेगा?

हकीकत कुछ भी हो पर यह सच है कि राठौड़ जैसे लोग हमारा विश्वास तोड़ते हैं। हमें रुचिका के परिवार वालों और शुभचिंतकों को सलाम करना चाहिए कि वे न्याय के लिए लड़ते रहे। दूसरे के कुकर्म की वजह से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हो गई थी और बेटी की मौत का सदमा तो था ही। फिर वर्दी वाले गुण्डों की फौज उन्हें डराने-धमकाने में लगी थी, पर वे लड़ते रहे। 19 साल के बाद राठौड़ को छह महीने की सजा दिलाकर उन्होंने एक बहस पूरे देश में पैदा कर दी है।

क्या हमारी व्यवस्था इतनी लचर हो गई है कि हम एक आतताई को सजा भी नहीं दिलवा सकते। कहावत है- रावण भी तो सीता के हरण के बाद ठहाके लगाता था। मुस्कुराते हुए राठौड़ साहब भी तो यही संदेश दे रहे थे कि मेरा जलाल और जलवा अभी कायम है। मीडिया और न्यायपालिका को कोसने वाले लोग शायद इस मामले से कुछ राहत महसूस कर सकते हैं।

यह मीडिया ही था जिसने इस मामले को लगभग दो दशक तक जिंदा रखा। जिस तरह जेसिका लाल के हत्यारे मीडिया की वजह से सलाखों के पीछे पहुंचे, वैसे ही एस.पी.एस. राठौड़ भी शिकंजे में फंस गए हैं। हमेशा की तरह कीचड़ उछाल अभियान भी चालू हो गया है। किसी राजनेता ने कहा कि उन्हें ओमप्रकाश चौटाला बचा रहे थे। चौटाला कह रहे हैं यह काम हमने नहीं बंसीलाल ने किया। कल इसका भी प्रतिवाद आ जाएगा। इन मगरमच्छी आंसुओं से उकताए लोगों के लिए यह खबर यकीनन सुकून भरी होगी कि सरकार बलात्कार और छेड़खानी के मुकदमों के लिए जल्द फैसलों की व्यवस्था करेगी।

इस सारे हंगामे के बीच एक सवाल मन में उठ रहा है कि रुचिका अगर जिंदा होती तो 33 साल की होती। शायद उसका घर बस गया होता, उसके बच्चे भी होते और अपने परिवार के साथ वह इस समय नया साल मनाने की तैयारी कर रही होती। तुम हमारे साथ नहीं हो रुचिका। पर यह तय है कि तुम्हारे खून की रंगत इतनी गाढ़ी थी कि वह इस देश की तमाम अन्य बेटियों के लिए काल की दीवार पर उम्मीद की लिखावट दर्ज कर जाएगी। शायद अगले साल हम कुछ ऐसे कानून बना सकें और ऐसे प्रावधान रच सकें कि राठौड़ जैसे लोग अपनी करनी पर हंसते हुए नजर न आएं। इन सभी आशाओं को पूरा होते देखने के लिए लोगों की नजर 2010 पर होगी।

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