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उर्दू मीडिया: बेचारगी के शिकार मुसलमान

रंगनाथ मिश्र कमीशन रिपोर्ट पर हुकूमत का ठंडा रवैया और नितिन गडकरी का भाजपा का नया अध्यक्ष बनाया जाना उर्दू मीडिया को पसंद नहीं आया। गडकरी का यह कहना कि राष्ट्रवाद की डोर वे किसी भी हाल में नहीं छोड़ेंगे।

उर्दू अखबार इससे सेक्युलरिज्म और मुल्क के अमन के लिए सही नहीं मानते। उनके आने से वाजपेयी और आडवाणी के नरम-गरम सियासत पर ब्रेक लगेगा। नए सदर आरएसएस मुख्यालय की पसंद हैं। इसलिए वे संघ के एजेंडों को आगे बढ़ाने की भरपूर कोशिश करेंगे। राममंदिर, कॉमन सिविल कोर्ड, धारा 370 जैसे मुद्दों को फिर से हवा दी जा सकती है। इसके लिए युवा चेहरों को अगली पंक्ति में लाया जा सकता है। वैसे संघ और गडकरी के इस कोशिश को पंक्चर करने की पहल भी हो गई है। उड़ीसा के एक भाजपा सांसद ने संघ के पार्टी में सीधे हस्तक्षेप की मुखालफत में बिगुल फूंक दिया है।

उर्दू अखबार लालकृष्ण आडवाणी को बीजेपी संसदीय दल का चीफ बनाने के बहाने उन्हें किनारे लगाने की बात कर रहे हैं। ‘बीजेपी तारीख का नया बाब’ में ‘सहाफत’ कहता है कि इसका मतलब है उन्हें पार्टी का चीफ बनाकर कहने भर की तरक्की दी गई है, हकीकत कुछ और है। उनसे ज्यादा बेहतर कौन जानता है कि उनकी सियासी जिंदगी के पिछले बाब अच्छे थे या अब के। नई भूमिका में आडवाणी रथयात्रा भी नहीं निकाल पाएंगे। ‘बीजेपी का मुस्तकबिल’ में अखबार कहता है पार्टी के नए सदर ने उमा भारती, कल्याण सिंह और गोविंदाचार्य को दोबारा बीजेपी में लाने का संकेत देकर जाहिर कर दिया कि आडवाणी ही नहीं उनके पूरे ग्रुप को हाशिए पर धकेलने की तैयारी है। ‘ऐतमाद’, ‘बीजेपी की नई कयादत और अंदेशे’ में कहता है पार्टी के बुजुर्गो को पीछे करने के लिए युवा चेहरों को आगे किया जा रहा है। ‘गडकरी की कयादत में बीजेपी की नई टीम’ में रोजनामा ‘सियासी उफक’ कहता है संघ की पसंद के गडकरी के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार आगे कैसा सियासी रिश्ता रखेंगे? यह देखना दिलचस्प होगा। अखबार अपने संपादकीय में कहता है। पिछले चुनावों में लगातार मिली पराजय से बिखरी बीजेपी को समेटना और पार्टी को आडवाणी के प्रभाव से मुक्त कराना नितिन गडकरी के सामने फिलहाल दो बड़ी चुनौतियां हैं।

उर्दू अखबार कांग्रेस के लिए रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट लागू कराने को बड़ी चुनौती मान रहे हैं। इसके बारे में अब तक मरकजी हुकूमत के रुख स्पष्ट नहीं करने से देश के मुसलमानों में दुविधा बनी हुई है। रोजनामा ‘राष्ट्रीय सहारा’ में सिराज लिखते हैं कि केंद्र सरकार हिंदूवादी ताकतों के डर से रिपोर्ट पर फैसला नहीं ले पा रही है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री समलान खुर्शीद को बार-बार बयान बदलना पड़ रहा है। ओबीसी के 27 प्रतिशत के कोटे से सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में मुसलमानों को दस और दूसरे अल्पसंख्यकों को पांच फीसदी आरक्षण देने का भाजपा और संघ परिवार विरोध कर रहे हैं। वे धर्म के आधार पर रिजर्वेशन देने के पक्ष में नहीं, जबकि जस्टिस मिश्र उनकी दलीलों से इत्तेफाक नहीं रखते। रिपोर्ट में कहा गया है मुस्लिम और ईसाइयों की दशा दूसरे धर्म के मानने वालों से कहीं ज्यादा बदतर है। उन्हें केवल इसलिए ओबीसी के दायरे से दूर रखा जाए कि वे मुसलमान हैं, न्यायसंगत नहीं। उनमें भी एक वर्ग वही पेशे अपनाए हुए है जिसकी वजह से हिंदू के वर्ग विशेष को आरक्षण का लाभ मिल रहा है। ‘इंकलाब’ तो मुसलमानों को ओबीसी का लाभ पहुंचाने के लिए शिड्यूल कास्ट की धारा 1950 को ही खत्म करने की वकालत कर रहा है। ‘हमारा समाज’ में अब्दुल खालिक ने रिजर्वेशन पर पहला हक मुसलमानों का बताया है।

आजादी मिलने के तुरंत बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद ने दिल्ली की जामा मस्जिद में तकरीर देते हुए मुसलमानों को मुल्क का अहम हिस्सा बताया था, जबकि आजादी के 62 वर्षो के बाद भी इनके समाजी, आर्थिक और तालीमी हैसियत में खास बदलाव नहीं आया है। हवालातों और जेलों में मुस्लिमों की तादाद तो बढ़ी, पर बाकी मैदानों में पिछड़ते चले गए। रेलवे और बैंकों की नौकरी में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ पांच और 3.5 फीसदी है। गृह मंत्रालय के 40 बड़े अफसरों में एक भी मुसलमान नहीं। फौज में मुस्लिम सिर्फ ढाई प्रतिशत हैं, जबकि कारगिल के शहीदों में इनकी हिस्सेदारी आठ प्रतिशत थी। पटना और रांची से प्रकाशित ‘कौमी तंजीम’ में नीतीश कुमार का बयान प्रमुखता से छापा गया है कि ओबीसी कोटे से रिजर्वेशन देने के नाम पर कांग्रेस मुसलमानों को बेवकूफ बना रही है।

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं

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