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कर्म के साथ धर्म

जाने-माने म्यूजिक डायरेक्टर नौशाद अली लिखते हैं, ‘जब तक गायक या गायिका म्यूजिक के जरिए ईश्वर को याद नहीं करता, तब तक उनका गीत-संगीत किसी दिल को नहीं छू पाएगा। लता मंगेशकर का म्यूजिक के प्रति आदर और प्यार पूजा के समान है। जब वह गाना रिकार्ड करती हैं, तो अपनी चप्पल बाहर स्टूडियो के प्रवेश द्वार पर उतार कर आती हैं, मानो मंदिर में दाखिल हो रही हों। उनके व्यवहार से जाहिर होता है कि उन्होंने गीत-संगीत को कभी प्रोफेशन नहीं माना, सदा धर्म के रूप में अपनाया।’

यही नहीं, स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर हर सुबह मां सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख गाती हैं- बेशक रिकार्डिग के वक्त या यूं ही। हरेक डॉक्टर भी अपने मरीज को दवा लिखने से पहले पीएक्स जरूर लिखता है, जिसके मायने ईश्वर को स्मरण करना ही है। वास्तव में, ईश्वर हर किसी के डीएनए में बसता है। बस जब उससे जुड़ते हैं, तो ईश्वर से रिश्ता और पनपता है। स्प्रिचुएलिटी हमारी शक्तियों को तेजतर्रार करती हैं और शक्तियां महज प्रार्थना से नहीं बनतीं, ताकि इंसान के बर्ताव या व्यवहार से फैलती हैं। जाहिर होता है कि जो शख्स हर क्षण काम करते जाते हैं और ईश्वर को सदा अपने अंग-संग रखते हैं, सफलता उनके पांव चूमती है। संत तुकाराम भी मानते और कहते हैं, ‘मेरे लिए मेरा काम ही पूजा है। मैं कारोबार भी प्रभु की आज्ञा मान कर करता हूं। जब-जब सामान बेचता हूं और तराजू की डंडी संतुलन में स्थिर होती है, तब-तब मैं अपने भीतर जा कर मन की परीक्षा लेता हूं कि तू जाग रहा है न? तू समता में स्थिर है या नहीं? साथ-साथ हर बार ईश्वर का स्मरण करता हूं। मेरा हर पल ईश्वर की आराधना है।’ बचपन में तो ईश्वर से रिश्ता केवल मतलब का होता है। जब कभी कुछ चाहिए, दौड़ कर भगवान के आगे हाथ फैला कर मांग लिया। यही क्रय शक्ति और विश्वास का जनक है, जिससे बुरे से बुरा वक्त भी अच्छे में तब्दील होता जाता है।                 

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