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आदमी का अंत

जब आतताई जी ने घोषणा की कि दुनिया में अब आदमी नहीं रहा तो हम उनको अवाक खड़े देखते रहे। हम इतना तो जानते थे कि आतताई को गोष्ठी, सम्मेलनों में भाग लेने का संक्रामक रोग है। यह रोग उन्हें मुरारी से लगा और मुरारी को बिहारी से। इस मर्ज के मरीज सबेरे जल्दी उठते हैं। सरदी, गरमी, बरसात में उनका यही निश्चित नियम है। उठते ही वह बरामदे में आते हैं और गिद्ध दृष्टि से पड़ोसी के दरवाजे की ओर देखते हैं। अपने आज तक पल्ले नहीं पड़ा है कि उनकी इस हरकत का कारण क्या है। ऐसा कभी कभार ही होता है कि सूरज उगने के पहले से ही अख़बार वहाँ पके फल सा न टपका हो।

चारों ओर के सन्नाटे में आकर आतताई का अंतर नई स्फूर्ति से भरता है। वह चारों ओर चोर नजरों से ताकता है। कहीं उसका कोई अनजान प्रतिद्वन्द्वी तो ताक लगाये नहीं बैठा है। एक साल से आतताई इस वारदात में लगे हैं। आज तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। फिर भी सतर्कता उनकी आदत है, जो रोजमर्रा की रूटीन बन गई है। संतुष्ट होकर वह यकायक प्रतीकात्मक तार की बाड़ फाँद कर पड़ौसी के घर में दाखिल होते हैं और अख़बार उठाकर उसी रास्ते अपनी सीमा में वापस। लौटकर वह अख़बार में ‘आज के कार्यक्रमों’ के अंतर्गत साहित्यिक सेमिनार-गोष्ठियों के मुआयने में जुटते हैं। बड़े शहर में रोज कुछ होना ही होना। आतताई कार्यक्रम का स्थान और समय अपनी डायरी में नोट कर, पहले के चौकन्ने अंदाज में उधार का अख़बार यथास्थान लौटाते हैं। कार्यक्रम अब तै है। गोष्ठी में उन्हें जाना ही जाना।
हमें लगा कि ऐसे ही किसी वैचारिक आदान-प्रदान में आतताई ने ज़रूर आदमी के अंत की भविष्यवाणी सुनी होगी और अब उससे हमें डरा-धमका रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम सब लेबल लगे आदमी हैं। कोई ब्राह्मण, कोई कायस्थ, कोई अगड़ा, कोई पिछड़ा। कोई नक्सल, कोई भुजबल, कोई लुहार, कोई सुनार, कोई अल्पसंख्यक, कोई बहुसंख्यक, कोई बुद्धिस्ट, कोई पारसी। न किसी गरीब अगड़े को आरक्षण का संरक्षण है, न किसी रईस पिछड़े को उसका अभाव।

इधर सियासी भाइयों ने एक नई नैतिक और आपराधिक संहिता ईजाद की है। आदमी दो तरह के हैं यानी अपने और पराये। जैसे दलित अपने बाकी पराये। यदि अपना भ्रष्टाचारी है, तो वह शर्तिया अगड़ा-बहुल व्यवस्था की साजिश का शिकार है। दुनिया जानती है कि वह पैदाइशी सदाचारी है। चलते-चलते आतताई चोट कर गये- ‘इन
लेबल बँटे लोगों में आपका कोई खालिस आदमी मिले तो ज़रूर बताना।’

 

 

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