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ऐसी पुलिस फिर जाएं तो जाएं कहां?

एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ के आरोपी को सजा दिलाने में हमारी न्यायिक व्यवस्था को 19 साल लग गये। इससे पता चलता है कि हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था को चलाने वाले या उससे जुड़े लोग कितने ईमानदार हैं। शायद यही वजह है कि लोगों का विश्वास कानून और पुलिस से उठता जा रहा है। लोग कहते है कि पुलिस से दोस्ती भी बुरी और दुश्मनी भी यह बात यहां बिल्कुल सही साबित होती नजर आ रही है। पुलिस से दुश्मनी करना कौन चाहता है उसके गलत कार्यों का विरोध करो तो हमें ही बलि का बकरा बनना पड़ता है।
देवेन्द्र कुमार, शाहबाद डेरी, दिल्ली
dev67alone@gmail.com
रुचिका के बहाने
रुचिका मामले ने न केवल महिला शोषण बल्कि, पुलिस प्रशासन के अत्याचार, न्यायप्रणाली की सुस्ती तथा राजनीतिक लीपापोती की पोल खोल दी है। ऊँची पहुँच वाले राठौर ने न केवल छेड़खानी की, बल्कि नाबालिग को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया। उसके परिवार वालों को अमानवीय यातनाए देकर उनकी मुश्किलों को और बढ़ाया है।
प्रज्ञा पाण्डेय, आर.के. पुरम, नई दिल्ली 
pragyapandeyps@gmail.com
झारखंड में खंडित जनादेश
यह विचारणीय प्रश्न है कि खंडित जनादेश क्यों मिलता है। मेरे विचार से हमारे देश की राजनीति में बिखराव आया है। चुनाव का असली मुद्दों जैसे गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था, आधारभूत ढाँचे का विकास, बिजली सड़क, पानी का प्रबंध इत्यादि के आधार पर न लड़ा जाना ही बिखराव का कारण है, हमारे यहाँ चुनाव जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर लड़े जाते हैं। इसी आधार पर वोट बैंक बन गए हैं। राजनीति के खंडित हो जाने से जनादेश भी खंडित ही मिलता है। हमारे लोकतंत्र में आधारभूत विसंगतियां भी खंडित जनादेश का कारण हैं।
डॉ. एस शंकर सिंह, सेक्टर 6, द्वारका नई दिल्ली 110075
महंगाई का गोरखधंधा
रोज अखबारों में खाद्य वस्तुओं की महंगाई विशेषकर सब्जियों का रोना रोया जा रहा है। उत्पादन की कमी बताई जाती है, मगर दुसरे ही पेज पर आजादपुर मंदी के रेट दिए जाते हैं जो काफी कम हैं। क्या कभी कोई सरकारी अमला इस विरोधाभास पर ध्यान देगा। कम उत्पादन की आड़ में बिचौलिए जमकर जनता का शोषण कर रहे हैं।
जगबीर सिंह मान, हमीदपुर, दिल्ली-36
कैंसर से बचाये राम
कैंसर नामक लगभग लाइलाज बीमारी का नाम सुनते ही मानव जाति के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होता जा रहा है। यह मांसाहार, मदिरापान, धूम्रपान, गुटका आदि अन्य व्यसनों के सेवन से मनुष्य को लपेटे में लेता है। भारतवर्ष में प्रतिवर्ष पचासी हजार मौतों का कारण कैंसर ही है। देश में कई बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान इसी से चांदी कूटने में जुटे हुए हैं। महंगी दवाएं पीड़ित की आर्थिक दशा पर भी ग्रहण लगा देती हैं। 
युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद

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