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ज्योतिष विद्या को वैज्ञानिक बनाने की आवश्यकता: प्रो.ओझा

मेरठ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.एसपी ओझा ने कहा है कि ज्योतिष को और वैज्ञानिक बनाने की आवश्यकता है। व्यक्ति को कर्म के साथ-साथ ज्योतिष को महत्व देना चाहिए। प्रो.ओझा रविवार को सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में ज्योतिष विभाग और ज्योतिष विज्ञान समिति द्वारा आयोजित दो दिवसीय ज्योतिष सम्मेलन के समापन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित कर रहे थे। प्रो.ओझा ने कहा कि खगोलीय क्षेत्र में हमारा ज्ञान अभी सीमित है। विज्ञान प्रकृति के सामने बौना है। प्रकृति के कई रहस्यों का जवाब दे पाने में सक्षम नहीं है। विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से  उन्होंने कहा कि ज्योतिष विद्या के सीमाओं की भी चर्चा की। कहा कि परिधि से बाहर निकलना होगा। दक्षिण भारत में ज्योतिष की कई संहिताएं है, उनमें निहित ज्ञान को अपने शास्त्रों में शामिल करना होगा।


अध्यक्षीय उद्बोधन में डा.नागेंद्र पाण्डेय ने कहा कि विज्ञान और ज्ञान हमेशा तथ्य के आधार पर आगे बढ़ता है। उहापोह शास्त्र का मूल आधार है। ज्ञान की परिधि का विस्तार तर्को और अनुभवों के माध्यम से किया जा सकता है। समापन समारोह में डा.चंद्रमौलि उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य हीरालाल और राधाकांत ओझा आदि मौजूद है। कार्यक्रम का संचालन डा.अखिलेश्वर मिश्र ने किया। इससे पहले समापन सत्र में दांपत्य जीवन में सप्तम भाव के महत्व पर चर्चा हुआ। ज्योतिषियों की इस विषय पर अलग-अलग राय व्यक्त की । आम राय यह थी कि कुंडली में चंद्रमा और शुक्र सप्तम भाव में रहता हो और ग्रह का स्वामी बलवान हो और पाप ग्रहों की दृष्टि न पड़े तो दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है। यदि सप्तम भाव में पाप ग्रह हो और अष्टम भाव में एक पाप ग्रह हो तो दांपत्य जीवन में खलल पड़ती है। यदि दो पाप ग्रह अष्टम भाव में और एक सप्तम भाव में हो तो तलाक का योग बनता है। इस सत्र में डा.गीता शर्मा, देवेंद्र गुप्ता, सदानंद मिश्र, डा.स्नेहमय चट्टोपाध्याय और डा.अखिलेश्वर मिश्र आदि ने विचार व्यक्त किए। ज्योतिष विभाग के छात्रों ने भी कई प्रश्न पूछे।

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