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बाजार में किताबों की देरी से अभिभावक-छात्र परेशान

दिल्ली-एनसीआर के निजी स्कूलों से एनसीईआरटी की किताबें चोरी छिपे गोल हो रही हैं। बाजार में इन किताबों के देर से आने की हर वर्ष की समस्या से स्कूल व अभिभावक दो-चार हो रहे हैं। निजी प्रकाशक स्कूलों में अपनी किताबें फिट कर रहे हैं और अभिभावकों की परेशानी बढ़ रही है।

ऐसे अभिभावक जिनके दो और इससे ज्यादा बच्चों एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, वे इस आस में बड़े बच्चों की किताबें संजोए बैठे रहते हैं कि छोटा बच्चा भी उस किताब से पढ़ लेगा लेकिन नया सत्र आते ही किताब बदल जाती है और उसके दाम भी पिछले साल की तुलना में बढ़े हुए होते हैं।

नोएडा के एक प्रतिष्ठित स्कूल के छात्र के अभिभावक नितिन ने कहा कि मेरा एक बच्चा कक्षा तीन जबकि दूसरा बच्चा कक्षा चार में पढ़ता हैं। वर्ष 2007 में बड़े बच्चों की किताबें संजो ली थी कि छोटा बच्चा उन किताबों से पढ़ लेगा और किताबों पर होने वाला तकरीबन 3000 रुपए तक खर्चा बच जाएगा। लेकिन नया सत्र आने पर दोनों की ही अधिकतर किताबें बदल गईं।

स्कूल से बात की तो पता चला कि निजी प्रकाशकों की किताबें कोर्स शुरू होने से पहले ही आ गई थी, साथ ही एनसीईआरटी की किताब से बेहतर तरीके से टॉपिक्स को समझाया गया था इसलिए कुछ किताबें बदल दी गई हैं। वर्ष 2008 में खरीदी गईं किताबें 2009 में काम नहीं आईं।स्कूल से पूछने पर जवाब मिला कि नए प्रकाशक की किताबें ज्यादा बेहतर हैं, इसलिए किताबें बदल दी गईं।

रॉकवुड स्कूल के प्रमुख सुनित टंडन का कहना है कि कुछ मामले में एनसीईआरटी तो कुछ मामलों में निजी प्रकाशकों की किताबें बेहतर होती हैं। एनसीईआरटी की किताबें समय पर बाजार में नहीं आती हैं और कई महीनों तक किल्लत बनी रहती है। निजी प्रकाशकों की किताबें छूट भी देती हैं और सीबीएसई की सेलेबस को भी फॉलो करती हैं, ऐसे में किताबें बदल दी जाती हैं।

रायन इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल अनुराधा शर्मा का कहना है, कि स्कूलों में विशेष तौर पर हिंदी, अंग्रेजी, सामाजिक विज्ञान, संस्कृत और कही-कही पर साइंस की निजी प्रकाशकों की किताबों को प्रमुखता दी जाती है। यह सही है कि किताबें बदलने से अभिभावकों की जेब पर बोझ पड़ता है लेकिन बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए स्कूल किताबें बदलने का फैसला लेने को मजबूर होते हैं।

कीमत जेब पर भारीः जूनियर विंग की किताबों के पूरे सेट पर तकरीबन 3,000 से 3,500 रुपए तक का खर्चा होता है। हर साल इस सेट के दामों में किताबों के हिसाब से 10-15 प्रतिशत का इजाफा किया जाता है। जहां पहले बड़े बच्चों की किताबें छोटे बच्चों को पढ़ाकर अभिभावक इस खर्च के बोझ से बच जाते थे वहीं अब हर साल सेट की कोई न कोई किताबें बदल जाने की वजह से यह खर्चा उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है और मुनाफा निजी स्कूल कमा रहे हैं।
                                                

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