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लोकसभा चुनाव में हार से मुख्यमंत्री ने खोई कुर्सी

उत्तराखंड में वर्ष 2009 के दौरान सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी में आपसी खींचतान और विद्रोही तेवरों के चलते मुख्यमंत्री के तौर पर रमेश पोखरियाल निशंक की ताजपोशी और भुवन चंद्र खण्डूरी को इस पद से हटाया जाना सबसे बडा राजनैतिक उलटफेर था ।

उत्तराखंड के गठन के बाद राज्य के दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्री बनने वाले भगतसिंह कोशियारी गुट के विद्रोही तेवरों और लगातार दबाव के चलते पार्टी हाईकमान ने आखिरकार 25 जून को खण्डूरी का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ले लिया और बाद में उन्हें निर्देश दिया कि वह तत्कालीन राज्यपाल बीएल जोशी को अपना इस्तीफा सौंप दें।

गुजरे साल में जहां 25 जून को खण्डूरी ने भारी मन से इस्तीफा दे दिया, वहीं 26 जून को राज्यपाल ने विधायक दल के नेता चुने गए रमेश पोखरियाल निशंक को राज्य में नई सरकार बनाने का न्यौता दिया।

राज्यपाल ने आनन-फानन में 27 जून को नैनीताल से देहरादून पहुंच कर निशंक को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी। उत्तराखंड की राजनीति में 17 जून को उस समय भूचाल आ गया जब राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोशियारी ने अपने ही दल के खण्डूरी को हटाने के लिए दबाव बनाते हुए सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि बाद में समझा बुझाकर उनका इस्तीफा वापस करा दिया गया।

राज्य की राजनीति में गुजरे साल उस समय एक नया मोड़ आया जब देश में हुए लोकसभा के लिए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड में अप्रत्याशित रूप से 16 मई को पांच की पांचों सीटों पर हार गई और सभी दिग्गज नेता इस परिणाम से भौंचक रह गए।

कोशियारी ने पांचों सीट हारने के बाद खण्डूरी को हटाने के लिए जबरदस्त दबाव बनाया और देश में उत्तराखंड पहला ऐसा राज्य बना जहां लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी का ठीकरा मुख्यमंत्री पर फोड़ते हुए खण्डूरी को हटा दिया गया।

राज्य में गुजरे साल में ही सत्तारूढ भाजपा को एक करारा झटका उस समय लगा जब इसके विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने छह अप्रैल को इस्तीफा दे दिया और नौ अप्रैल को बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गया। हालांकि बाद में उनको बसपा ने भी बड़बोलेपन के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया।

राज्य में पहली बार राज्य विधानसभा में उपाध्यक्ष पद के लिए परंपरा से हटकर सत्तारूढ़ भाजपा ने इस पद को भी अपने पास रखा और विजय बडथ्वाल को उपाध्यक्ष चुन लिया। हालांकि राज्य मंत्रिमडल में शामिल होने के बाद बडथ्वाल ने एक जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

मुख्यमंत्री बनने के बाद निशंक को पहले झंझावत का सामना उस समय करना पडा जब तीन जुलाई को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के दौरे के समय गाजियाबाद के एक युवक रणवीरसिंह को कथित फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया। हालांकि इस मामले को बड़ी सूझ-बूझ से निशंक ने निपटाते हुए जहां देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को उनके पद से हटा दिया, वहीं सात पुलिसकर्मियों को छह जुलाई को निलंबित कर दिया। 8 जुलाई को इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई।

राजनैतिक मोर्चे पर गुजरे साल में प्रमुख विपक्षी कांग्रेस के नेता और विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के उपनेता तिलकराज बेहड ने भाजपा के एक नेता द्वारा जान से मारने की धमकी दिए जाने पर 13 जुलाई को पूरे दिन विधानसभा ही नहीं चलने दी।

राज्य में लोकसभा चुनाव हारने के बाद सत्तारूढ़ भाजपा को उस समय थोड़ी राहत मिली जब विधानसभा के लिए हुए दो उप चुनावों में पार्टी ने विजय दर्ज की। कपकोट विधान सभा क्षेत्र का चुनाव परिणाम एक जून को आया और 14 सितंबर को विकासनगर क्षेत्र का परिणाम आया। इन दोनों में भाजपा ने आश्चर्यजनक ढंग से विजय दर्ज की।

उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी 19 सितंबर को अपने बलबूते पर विधानसभा में पहली बार बहुमत हासिल करने में कामयाब हुई जब इसके 36वें विधायक के रूप में कुलदीप कुमार ने शपथ ली। इसके पहले भाजपा को बहुमत के लिए अपने सहयोगियों का मुंह ताकना पड़ता था।

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