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सदन की गरिमा के हनन के नाम रहा साल 2009

संसद और विधानसभाओं में हंगामा और हाथापाई की घटनाओं से राजस्थान विधानसभा भी इस साल अछूती नहीं रही, यह अलग बात है कि अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह शेखावत द्वारा विधानसभा के निर्देश और विधायकों को हल्केपन से ले रही कार्यपालिका पर जो घेरा कसा उसे बरसों तलक याद किया जाएगा।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के रवैये पर ऐतराज करते हुए कहा कि प्रतिपक्ष ने राज्यपाल को एक बार और सदन के नेता को चार बार बोलने नहीं दिया। एक जमाना था जब सदन का नेता या नेता प्रतिपक्ष बोलते थे तो सदन एकदम शांत रहता था, अब स्थिति ऐसी नहीं है। सरकार सदन चलाना चाहती है प्रतिपक्ष बेवजह हंगामा शोर-शराबा कर सदन नहीं चलने देता। उन्होंने राजस्थान में विधान परिषद के गठन की संभावना पर कहा कि अगर पार्टी स्तर पर इस बारे में फैसला हुआ तो देखेंगे।
   
राजस्थान विधानसभा में बीते साल हुडदंग, हाथापाई, अध्यक्ष का अपमान, विधायकों का निष्कासन हुआ और फिर सदन की राय से निष्कासित सदस्यों का निष्कासन बहाल हुआ। प्रतिपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के सदस्यों ने भी प्रतिपक्ष के खिलाफ नारेबाजी कर अपने गले साफ किए।

राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत ने विधायिका द्वारा किए निर्णयों पर, कई साल बीत जाने के बावजूद प्रश्नों के जवाब नहीं भेजने पर मुख्य सचिव और करीब 11 विभागों के प्रमुख शासन सचिवों को तलब किया।

राजस्थान विधानसभा के सूत्रों का कहना है कि ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ जब अध्यक्ष के आदेश पर मुख्य सचिव और आला अधिकारियों की फौज एक साथ विधानसभा पहुंची हो।

पूर्व मुख्य सचिव कुशाल सिंह और मौजूदा मुख्य सचिव टी श्रीनिवासन ने विधान सभा अध्यक्ष के समक्ष उपस्थित होकर विधायिका के निर्देशों का समय पर पालन नहीं होने के लिए खेद व्यक्त करते हुए भविष्य में प्रश्नों के जवाब नियत समय में देने का भरोसा दिलाया।

राजस्थान विधान सभा अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि विधायकों के प्रश्नों के जवाब समय पर आए और विधानसभा द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन समय पर हो इसके प्रयास कर रहा हूं।

बीते साल में हुए विधानसभा चुनाव में 28 महिला विधायकों के जीतने का रिकॉर्ड बनाने वाली राजस्थान विधानसभा की वरिष्ठ कांग्रेस विधायक जकिया ने कहा कि समाज में आई गिरावट का ही नमूना हम एक कमरे 'विधानसभा' में देख रहे हैं।

जकिया ने कहा कि वरिष्ठ विधायक ही हंगामे में शामिल हो रहे हैं तो नए विधायकों से क्या उम्मीद की जा सकती है। आखिर विधायक भी तो समाज से ही आते हैं, जब समाज में ही गिरावट आई है तो इसका असर तो सदन में नजर आएगा ही।

एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि पहले मजाक ही मजाक में बहुत कुछ कह दिया जाता था, लेकिन अब तो पहले जैसा माहौल है ही नहीं। पहले एक दूसरे के प्रति सम्मान था, सदन में बांहें चढ़ती थीं, लेकिन विषय समाप्त होने के साथ ही सब कुछ सामान्य हो जाता था, लेकिन अब तो स्थिति ही बदल गई है। सदन की बैठकें हंगामे, हुड़दंग की भेंट चढ़ जाती हैं।

पहली बार विधायक चुनकर विधानसभा पहुंची भारतीय जनता पार्टी की अनिता सिंह ने कहा कि बड़े अरमान से विधानसभा गई थी, लेकिन हंगामे, शोर-शराबे ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। भगवान से दुआ कर रही हूं कि सभी को सदबुद्धि दे, जिससे सदन में हंगामा नहीं हो। स्कूली बच्चों को सदन की ऐसी कार्यवाही दिखाकर आखिर हम उन्हें क्या सिखा रहे हैं।

राजस्थान विश्वविद्यालय के शोध छात्र अवधेश कुमार ने सुझाव दिया कि सार्थक चर्चा के लिए संसद की प्रश्नकाल की कार्यवाही की तर्ज पर राजस्थान विधानसभा के प्रश्नकाल का ही नहीं, बल्कि पूरी कार्यवाही का विधानसभा के चैनल द्वारा सीधा प्रसारण होना चाहिए ताकि मतदाता अपने जनप्रतिनिधि का व्यवहार देख सकें।

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