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गुजरात: विवादों और उथल-पुथल से भरा रहा पूरा साल

गुजरात में वर्ष 2009 में जहरीली शराब त्रासदी और 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के सिलसिले में एक मंत्री की गिरफ्तारी सुर्खियां बनीं। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह मिलाजुला साल रहा क्योंकि जहां उन्हें लोकसभा चुनावों में भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया गया वहीं भाजपा की पराजय ने उनकी राष्ट्रीय भूमिका संक्षिप्त कर दी।

केंद्र में दूसरे कार्यकाल के लिए सत्ता संभालने के बाद संप्रग सरकार ने 19 जून को गुजरात संगठित अपराध नियंत्रक विधेयक तीन संशोधनों की सिफारिश के साथ राज्य को लौटा दिया। यह विधेयक गुजरात विधानसभा ने पारित किया था। बहरहाल, केंद्र की सिफारिश खारिज करते हुए राज्य सरकार ने 28 जुलाई को एक बार फिर विधानसभा में पारित कर दिया। केंद्र राज्य के बीच टकराव का संकेत देते हुए विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेज दिया गया।

लोकसभा चुनावों में मोदी स्टार प्रचारक रहे। कुछ उद्योगपतियों और पार्टी सहयोगियों ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री बताया। लेकिन चुनावों में भाजपा का फीका प्रदर्शन मोदी के लिए झटका साबित हुआ। कई भाजपा नेताओं ने कह दिया कि पार्टी की पराजय का एक कारण मोदी को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करना भी था।

राज्य में दस सितंबर को सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए जिनमें भाजपा ने पांच सीटें कांग्रेस से छीन लीं। इससे संकेत मिलता है कि मोदी गुजरात वासियों की गुड बुक में हैं।

मोदी को इस साल कानूनी मुद्दों से भी दो चार होना पड़ा। उच्चतम न्यायालय ने 27 अप्रैल को इस शिकायत की जांच करने के लिए विशेष जांच दल गठित करने का आदेश दिया कि मोदी, उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी, पुलिस अधिकारी और वरिष्ठ नौकरशाहों की 2002 में गोधरा नरसंहार के बाद हुए दंगों में भूमिका थी। राज्य की एक मंत्री माया कोदनानी को 2002 के नरोदा पटिया दंगों में कथित भूमिका के कारण 27 मार्च को विशेष जांच दल के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा।

उसी दिन उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। उन्हें तथा पूर्व विहिप नेता जयदीप पटेल को  गिरफ्तार कर लिया गया। मोदी ने जनवरी में आयोजित वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर समिट के आयोजन का श्रेय खुद को दिया। दो साल में एक बार आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में 12 लाख करोड़ रुपये के निवेश के लिए सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए।

मोदी ने गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष पद 15 सितंबर को हुए चुनाव में कांग्रेस से छीन लिया। आम चुनावों से पहले राज्य सरकार ने 27 फरवरी को विवादास्पद पुलिस महानिदेशक पीसी पांडे को इस आशंका के चलते हटा दिया कि निर्वाचन आयोग उनका तबादला कर सकता है। राज्य में 2002 में हुए दंगों में पांडे का नाम आया था। पांडे की जगह शेखदम खंडावाला की नियुक्ति की गई। खंडावाला गुजरात में अल्पसंख्यक समुदाय से डीजीपी बनने वाले पहले आईपीएस अधिकारी हैं।

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के दिग्गज शंकर सिंह वाघेला, नारण राठवा और मधुसूदन मिस्त्री हार गए। राज्य में जुलाई में जहरीली शराब पीने से 140 से अधिक व्यक्तियों की जान गई। इस त्रासदी पर विधानसभा के बजट सत्र में बहस के लिए समय देने से अध्यक्ष के इंकार करने के बाद विपक्षी कांग्रेस ने सत्र का बहिष्कार कर दिया। राज्य सरकार ने 28 जुलाई को बॉम्बे प्रोहिबिशन [गुजरात एमेंडमेंट] बिल 2009 पेश किया जिसमें अवैध शराब का कारोबार करने वाले को अधिकतम कठोर सजा के तौर पर मृत्युदंड देने का प्रावधान है। विधानसभा में यह विधेयक पारित कर दिया गया।

यह विधेयक हालांकि राज्यपाल एससी जमीर ने राज्य सरकार को लौटा दिया था। लेकिन दिसंबर में तीन दिवसीय सत्र में इसे मूल रूप में एक बार फिर पारित कर दिया गया। विधानसभा में एक और महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया गया जिसके तहत स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान अनिवार्य कर दिया गया। ऐसा करने वाला गुजरात देश का पहला राज्य बन गया है।

मोदी सरकार ने 19 अगस्त को जसवंत सिंह की किताब जिन्नाः इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेन्डेन्स पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि इसमें उल्लिखित संदर्भों से देश के पहले गृह मंत्री दिवंगत सरकार वल्लभभाई पटेल की छवि धूमिल होती है। लेकिन चार सितंबर को गुजरात उच्च न्यायालय ने यह प्रतिबंध हटा दिया।

राज्य में अब तक स्वाइन फ्लू से 64 व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है। मोदी को भी स्वाइन फ्लू का संक्रमण हुआ और पांच दिनों तक उन्हें अपने आवास में अलग थलग रहना पड़ा।

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