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आर्थिक तूफान से बच निकला जहाजरानी उद्योग

वर्ष 2008 में शुरू हुए वैश्विक आर्थिक संकट का बखूबी सामना करने के बाद घरेलू जहाजरानी उद्योग अब तेजी की ओर बढ़ रहा है और नए साल में यह नई ऊंचाईयां छूने को तैयार है।

जहाजरानी क्षेत्र ने इस साल दो अग्रणी पोत विनिर्माताओं को एक ऑफशोरिंग ड्रिलिंग फर्म पर नियंत्रण के लिए जद्दोजहद करते देखा। वहीं दुबई वित्तीय संकट ने भी इस उद्योग के लिए मुश्किलें बढ़ाईं।

इस साल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र की हिंदुस्तान शिपयार्ड की कमान रक्षा क्षेत्र को सौंप दी गई ताकि वह परमाणु पनडुब्बियां बनाने के अलावा दो नए शिपयार्ड स्थापित कर सके।
  
इसके अलावा पीपीपी (सार्वजनिक-निजी सहयोग) आधारित परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए जहाजरानी मंत्रालय ने बंदरगाह अधिकारियों को ये अधिकार दिए कि अब वे बिना मंत्रालय की मंजूरी के बोली में सफल कंपनियों को ठेके दे सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप नेशनल मैरीटाइम डेवलपमेंट प्रोग्राम (एनएमडीपी) के तहत 47 परियोजनाएं पूरी की गईं, जबकि 16,487.95 करोड़ रुपये मूल्य की 71 परियोजनाओं पर काम चल रहा है।

निवेश के मामले में सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 55,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। लेकिन यह खर्च 2009 में शुरू हुआ। जहाजरानी क्षेत्र में निवेश को लेकर वास्तव में प्रगति 2009 में शुरू हुई जब विलंब रियायत समझौते को अंतिम रूप देने में ढीला रवैया जैसे मुद्दों को हल करने के लिए एक अधिकार प्राप्त समिति का गठन हुआ।

इससे पहले सरकार को बंदरगाह की क्षमता में केवल 7 करोड़ टन बढ़ोतरी से संतुष्ट होना पड़ा। सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में 12 प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता मौजूदा 50.5 करोड़ टन से बढ़ाकर 101.65 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा है।

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