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गोरा बनने की चाहत ने भारी की कंपनियों की जेब

वैश्विक आर्थिक संकट के कारण जहां हर क्षेत्र का कारोबार जमीन को छू रहा था वहीं एक उद्योग था जिसने उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लोगों को गोरा और युवा बनाने, दांतों को मोतियों की तरह चमकाने, बच्चों को और मजबूत तथा लंबा बनाने एवं शौचालय को चमकाने के सपने बेचकर 2009 में मंदी के असर से स्वयं को बचाए रखा।

अपने रंग-रूप को लेकर सचेत ग्राहकों ने एफएमसीजी कंपनियों की बिक्री बढ़ाई, जिन्होंने रंग गोरा बनाने वाले और युवा बनाए रखने वाली एंटी एजिंग क्रीम, नहाने के साबुन जैसी चीजों की कीमत नहीं बढ़ाकर ग्राहकों को थोड़ी राहत दी। सूखे और बाढ़ से प्रभावित अर्थव्यवस्था में लागत बढ़ोतरी के बावजूद इन कंपनियों ने उक्त उत्पादों की कीमत बढ़ाने की बजाए पैकेजिंग पर खर्च कम कर लागत और मुनाफे को संतुलित किया।

उद्योग मंडल फिक्की ने कहा यह क्षेत्र हालिया चुनौतियों के साथ अच्छी तरह तालमेल बिठाकर चल रहा है और पिछले साल इसमें 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

एफएमसीजी बाजार के आगे बेबस मंदी
देश का एफएमसीजी बाजार 25 अरब डॉलर यानी 1,20,000 करोड़ रुपए का है। बाजार शोध करने वाली कंपनी एसी नील्सन के मुताबिक साल 2009 में कुछ आधुनिक खुदरा फॉर्मेट वाले स्टोर भी खुले और आक्रामक मार्केटिंग पॉलिसी के साथ घरेलू एफएमसीजी कंपनियों ने हिंदुस्तान यूनिलिवर लिमिटेड (एचयूएल) के बाजार शेयर पर हाथ मारा।
   
नील्सन ने कहा कि व्यक्तिगत देखभाल से जुड़े 8,000 करोड़ रुपए के बाजार में एचयूएल की हिस्सेदारी घटकर 44.5 फीसद रह गई, जो पिछले साल 50 फीसदी थी। क्योंकि आईटीसी, गोदरेज और विप्रो जैसी कंपनियां उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात जैसे बाजारों में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करती रहीं।

इस साल विलय और अधिग्रहण बहुत कम हुए। विप्रो का ब्रिटेन की कंपनी यार्डले के विदेशी परिचालन को 210 करोड़ में खरीदना इस साल की बड़ी घटना थी।

फास्ट फूड की चाहत बड़ी
खाद्य एवं पेय क्षेत्र में भारतीय बाजार कोका-कोला और पेप्सीको जैसी विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों के लिए वृद्धि का रास्ता दिखाता रहा, जबकि उनकी अमेरिकी मूल कंपनियां बिक्री में गिरावट से जूझ रही थीं।

पेप्सीको का भारतीय बाजार के प्रति आशावाद इस घटना से भी स्पष्ट हुआ कि इस वैश्विक कंपनी ने इस साल पहली बार अपने निदेशक मंडल की बैठक भारत में की। कंपनी ने 10 करोड़ डॉलर का निवेश किया।

लागत में बढ़ोतरी से खाद्य एवं पेय खंड के लिए मुश्किलदेह रहा। विशेष तौर पर बढ़ती चीनी की कीमतों ने इसे प्रभावित किया। राष्ट्रीय राजधानी में चीनी की कीमत करीब 40 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गई।
   
पेप्सीको, ब्रिटेनिया, आईटीसी और पार्ले ने लागत में बढ़ोतरी से निपटने के लिए कीमत बढ़ाने पर गंभीरता से विचार किया लेकिन फिर इसे रोक दिया।

गांवों में बढ़ी पैठ
इधर डाबर और इमामी ने क्रमश: फेम केयर और झंडू फार्मास्यूटिकल्स के अधिग्रहण के बाद पुनर्गठन का काम पूरा कर दिया। विप्रो, यार्डले के विदेशी परिचालन के अधिग्रहण के साथ आगे बढ़ती रही। सरकार के कृषि और ग्रामीणों को रोजगार आवंटन में बढ़ोतरी पर जोर दिए जाने से उत्साहित अन्य एफएमसीजी कंपनियां ग्रामीण इलाकों की ओर और तेजी से बढ़ती रहीं।

एचयूएल भी अपनी प्रमुख स्थिति को बरकरार रखने के लिए नए प्रयोग करती रही। इसने स्टार और जी का पूरे दिन का समय लिया। इसके अलावा लक्स, लिरिल और ब्रीज जैसे उत्पादों को फिर से पेश किया और बड़े बाजार को आकर्षित करने के लिए कीमत भी घटाई। कुल मिलाकर एफएमसीजी क्षेत्र की संभावनाएं अच्छी रहीं।

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