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बहुत गाढ़ी है रुचिका के खून की रंगत

इस देश में जब पल दर पल के न्यूज चैनल शुरू हो रहे थे तब हम में से किसी ने नहीं सोचा था कि भ्रष्टाचारी और अपराधी भी कैमरे के सामने विजेताओं की तरह पेश आना सीख जाएंगे। जेल जाते हुए मध़ु कोड़ा का हाथ हिलाना अपने गाल पर तमाचे की तरह लगा था। इसी तरह यौन शोषण के मामले में सजा पाए पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस राठौड़ जब अदालत से बाहर निकले तो उनके चेहरे पर हंसी देखकर धक्का लगा था। क्यों हंस रहे थे वे? अदालत ने साबित कर दिया था कि जिस कानून की रक्षा की उन्होंने शपथ खाई थी, उसी की धज्जियां उड़ाने के वे गुनहगार साबित हुए थे। यह बात हंसने की नहीं रोने की थी, पर कैमरे की बलिहारी, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं और जिन लोगों को चिल्लाना चाहिए वे गुनगुनाने लगे हैं।

राठौड़ के मामले ने कई बेहद दुखद प्रसंग याद दिला दिए। एक हिंदीभाषी प्रदेश में कभी खबरें आम थी कि मुख्यमंत्री खुद पैसे लेकर थाने नीलाम कर रहे हैं। तरह-तरह की अफवाहें हवा में तैर रही थीं। यकीनन इनमें से कई कपोलकल्पित और सियासी दुश्मनों  द्वारा रची गई होंगी। उन्हीं दिनों मुझे दो आईपीएस अधिकारियों से कुछ अन्तराल में मिलने का मौका मिला। पहले की ख्याति बेहद ईमानदार अफसर की थी। वे प्रदेश पुलिस सेवा के अफसर हुआ करते थे और बरसों की मशक्कत के बाद आईपीएस बन सके थे। मैंने उनसे पूछा कि इन चरचों और चरखों की असलियत क्या है?

उनका जवाब था- भाईसाहब, आप जानते नहीं हैं कि हम जैसे लोगों को कितनी जिल्लत से दो-चार होना पड़ रहा है। कल मैंने जिले के थानेदारों की मीटिंग बुलाई थी। एक थाना प्रभारी से पूछा कि आपके यहां अपराध क्यों बढ़ रहा है? उसका जवाब था कि हम क्या करें? अपराध रोकें तो लोगों की जेब कैसे भरें? उनका कहना था कि मैंने जब उसे उसकी अभद्रता के लिए टोका तो उसने कहा कि आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मैं यहां तक जानता हूं कि मुख्यमंत्री के कुर्ते में कितने बटन हैं और जूते में कितनी कीलें लगी हुई हैं? यह कहते-कहते उनकी आवाज भर्रा गई थी और आंखों के कोर नम हो चले थे। वे बाद में बहुत ऊंचे ओहदे से रिटायर हुए लेकिन हर नई मुलाकात में मैंने उन्हें पहले से ज्यादा असहाय और कुंठित पाया।

अब इसका ठीक उलटा एक उदाहरण। भारतीय पुलिस सेवा के एक अन्य अफसर हैं जो हमेशा समाचारों में बने रहने के अभ्यस्त हैं। मैंने उनसे भी थानों की बिक्री का सवाल पूछा था? जवाब था कि चुनाव इतने महंगे हो गए हैं कि राजनीति करने वालों को मजबूरन इधर-उधर से कमाना पड़ता है। ऐसे में हम लोग यदि एक ‘अच्छी सरकार’ को बनाने और चलाने में मदद कर दें, तो बुराई क्या है? इस पर मेरा अगला सवाल था कि इससे तो अनुशासित फोर्स की आदत खराब हो जाएगी, फिर अपराधों को रोकेंगे कैसे? जवाब चौंकाने वाला था। वे बोले कि मैं सिर्फ व्यावहारिक और अपेक्षाकृत कम बेईमान अफसरों को थाने देता हूं।

कई साल बीत गए। मैं आज तक इस गुत्थी को नहीं सुलझा पाया हूं कि व्यावहारिक तौर पर कम या ज्यादा बेईमान लोग कैसे होते हैं? इन्हें मापने का पैमाना क्या होता है? हम जिस परंपरा के लोग हैं वहां सच को छिपाने की भी सजा मिला करती थी। युधिष्ठिर ने कहा था - अश्वस्थामा हतो नरो वा कुंजरो। कहते हैं कि पांडव जब सदेह स्वर्ग जा रहे थे तो अपने-अपने पापों की वजह से युधिष्ठिर के अलावा सभी हिमालय की बर्फ में गल गए, अकेले धर्मराज वहां पहुंचे। चूंकि एक बार उन्होंने पूरी तरह सच का साथ नहीं दिया था तो उनकी एक उंगली गल गई थी, सजा के तौर पर।

महाभारत का यह आख्यान एक परंपरा, एक सोच और एक सीख को दर्शाता है। मतलब साफ है- सत्य, निष्ठा और ईमानदारी में मिलावट नहीं की जा सकती। जब-जब इसमें घालमेल किया जाता है तो महाभारत होता है। महाभारत सिर्फ एक महाकाव्य नहीं है। वह बताता है कि जब भी सत्ता में बैठे लोग स्वार्थ से अंधे होने लगते हैं तो भयानक खूरेंजी होती है। ओशो की माने तो महाभारत ने इस बहादुर देश का सबसे बड़ा नुकसान किया है। इस घरेलू जंग की वजह से समूचे आर्यावर्त के हर परिवार ने अपने प्रिय गंवाए। इससे यह देश युद्धभीरू बन गया। यही वजह थी कि बाद में बाहर से आने वाले हर हमलावर से हम हारते आए।

हकीकत कुछ भी हो पर यह सच है कि राठौड़ जैसे लोग हमारा विश्वास तोड़ते हैं। हमें रुचिका के परिवार वालों और शुभचिंतकों को सलाम करना चाहिए कि वे न्याय के लिए लड़ते रहे। दूसरे के कुकर्म की वजह से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हो गई थी और बेटी की मौत का सदमा तो था ही। फिर वर्दी वाले गुण्डों की फौज उन्हें डराने-धमकाने में लगी थी, पर वे लड़ते रहे। 19 साल के बाद राठौड़ को छह महीने की सजा दिलाकर उन्होंने एक बहस पूरे देश में पैदा कर दी है।

क्या हमारी व्यवस्था इतनी लचर हो गई है कि हम एक आतताई को सजा भी नहीं दिलवा सकते। कहावत है- रावण भी तो सीता के हरण के बाद ठहाके लगाता था। मुस्कुराते हुए राठौड़ साहब भी तो यही संदेश दे रहे थे कि मेरा जलाल और जलवा अभी कायम है। मीडिया और न्यायपालिका को कोसने वाले लोग शायद इस मामले से कुछ राहत महसूस कर सकते हैं।

यह मीडिया ही था जिसने इस मामले को लगभग दो दशक तक जिंदा रखा। जिस तरह जेसिका लाल के हत्यारे मीडिया की वजह से सलाखों के पीछे पहुंचे, वैसे ही एस.पी.एस. राठौड़ भी शिकंजे में फंस गए हैं। हमेशा की तरह कीचड़ उछाल अभियान भी चालू हो गया है। किसी राजनेता ने कहा कि उन्हें ओमप्रकाश चौटाला बचा रहे थे। चौटाला कह रहे हैं यह काम हमने नहीं बंसीलाल ने किया। कल इसका भी प्रतिवाद आ जाएगा। इन मगरमच्छी आंसुओं से उकताए लोगों के लिए यह खबर यकीनन सुकून भरी होगी कि सरकार बलात्कार और छेड़खानी के मुकदमों के लिए जल्द फैसलों की व्यवस्था करेगी।

इस सारे हंगामे के बीच एक सवाल मन में उठ रहा है कि रुचिका अगर जिंदा होती तो 33 साल की होती। शायद उसका घर बस गया होता, उसके बच्चे भी होते और अपने परिवार के साथ वह इस समय नया साल मनाने की तैयारी कर रही होती। तुम हमारे साथ नहीं हो रुचिका। पर यह तय है कि तुम्हारे खून की रंगत इतनी गाढ़ी थी कि वह इस देश की तमाम अन्य बेटियों के लिए काल की दीवार पर उम्मीद की लिखावट दर्ज कर जाएगी। शायद अगले साल हम कुछ ऐसे कानून बना सकें और ऐसे प्रावधान रच सकें कि राठौड़ जैसे लोग अपनी करनी पर हंसते हुए नजर न आएं।

Shashi.shekhar@hindustantimes.com

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