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अपना ‘आफ द ईयर’

मैं अपना ‘आफ द ईयर’ ढूंढ़ रहा हूं, लेकिन मेरे मन में बैठा विचित्र संदेहवादी कहता है कि इस निरंतर बिखरते उत्तर आधुनिक समय में भी कोई एक साल तक चलने वाला भरोसा हो सकता है? जिस दौर में आदमी-आदमी पर भरोसा करना छोड़ चुका हो उसमें किसी पर दांव लगाना, किसी से दिल लगाना, किसी को अपने कल्पना का हीरो कह देना जोखिम भरा काम है।

नुक्ताचीनी करना जिसका अटूट स्वभाव हो उस आलोचक के लिए कौन है जो आदर का पात्र हो सकता है? हर रोज हरेक की निंदा करते, हर पल क्रिटिकल बने रहने की जिद को पालने वाले, हरेक का छिद्रान्वेषक बनने वाले, निजकृत उपहास वक्रता के वक्र-रस में डूबने वाले, दूसरे की बात काटकर अपनी बात की फतह की खयाली झंडी फहराने के आदी बिंदास बाबू की मुश्किल यही है कि जिन दिनों में कुछ भी पक्का नहीं मिलता उन दिनों एक हीरो तलाश रहा है। यह समय खलनायकों का समय है। खलनायक ऑफ द ईयर ढूंढ़ना हो तो वे यत्र-तत्र सर्वत्र दिखते रहे हैं। नायक? भले वह एक दिन का ही हो, कहां है? 

जिस समय कुछ भी साबुत-सालिम नहीं नजर आता हो और हर चीज ‘विखंडित’ कहने से पहले ही टूटी जा रही हो वहां दो मिनट के लिए कोई टिका रहने वाला एक अदद भरोसेमंद बंदा हो तो वह कौन हो सकता है? क्या अब भी भ्रम है कि कोई हो सकता है? ये दिन ‘नित्य हीरो’ के हैं। अमर हीरोज के नहीं हैं।
 
क्या नित्य हीरो भी कहीं बचा है? यही उत्तर आधुनिक हीरो है जो नित्य है,‘सब कुछ’ की जगह ‘कुछ कुछ’ करने वाला है। साल बीतता है तो ऑफ द ईयर होने लगता है।‘फलां आफ द ईयर’। ‘ढिकां आफ द ईयर’। यह एक साल का हीरो तलाशना अपने आप में एक उत्तर आधुनिक चलन है। साल के 365 दिन हैं। हीरो नित्य हैं।
जिन दिनों स्टाक मार्केट सुबह से शाम तक बूम और बस्ट का अभ्यासी हो जिस समय में सब्जियां और
बुद्धिजीवी सुबह-दोपहर-शाम रात में हिंदी फिल्मों के हीरो-हीरोइनों के कपड़े बदलने की तरह पल-पल भाव बदलते रहते हों उस सुपर फिसलन भरे समय में किसे टिकाऊ कहा जाए जो अपने रास्ते पर कुछ दूर चलता जाता हो कुछ देर तक अडिग रहे और इस तमाशाई जगत में निरा तमाशा बनने से इनकार करता हो। ज्यों ज्यों मेरी कलम उस नाम की ओर बढ़ती जा रही है अचानक मुझे अपने हिंदीवालों की जमात का खयाल आ रहा है। नाम लिया तो फलां क्या कहेगा?

टीवी के बनाए ‘हाइपर रीयल’ खेल में जनवरी-फरवरी के चुनावी हीरो याद नहीं आते। नई सरकार याद नहीं आती। मनमोहन जी का दोबारा प्रधानमंत्री बनना नई बात नहीं लगती। मंदी महंगाई की बातें भी नहीं टिक पातीं। तभी अचानक मेरा ऑफ द ईयर सामने आया। वह अखबार में था। उसकी तस्वीर मेरे सामने प्रकट हो पूछती सी लगी- शहर छोड़कर क्या तुमने कभी अपना गांव देखा है? मैंने नहीं देखा जाना सो मैं देख रहा हूं समझ रहा हूं जनता से जुड़ रहा हूं, लेकिन क्या तुमने अपना गांव देखा जाना है?

एक दरिद्र से गांव में एक कच्चे से घर में एक ग्राम्य महिला के हाथों से गरम दाल रोटी उसी तरह खा रहा था जिस तरह इस देश का साधारण आदमी खाता है। बहुत दिनों से ऐसे चित्र और रिपोर्टे आ रही हैं जिनमें तीन चार दिन की दाढ़ी बढ़ाए, कुरता पाजामा पहने, चश्मेवाला, घुंघराले बालों वाला एक युवा गांवों में जा-जाकर कुछ खोज रहा है। वह क्या खोज रहा है? लोग कहते हैं कि यह सब ड्रामा है, लेकिन अगर ड्रामा ही करना होता वह आसानी से किया जा सकता था। उसके स्वाइन फ्लू के खतरे से भरे इन दिनों में गंदे गरीब जनों के बीच जाने की क्या जरूरत है?

नहीं। वह कुछ अलग है। और मुझे वह शाम याद आई जब वह अपनी बहन के साथ रायबरेली या शायद अमेठी में चुनाव परिणाम के ऐन बाद कैमरों से कुछ वाक्य बोला- वह आडवाणी का सम्मान करता है.. गलाकाट चुनाव के दौर में एक मामूली उदार वाक्य के लिए तरसता यह मन खिल उठा कि कहीं न कहीं कुछ युवा उदार स्पेस बन रहा है जो फ्री फाइट के इस निर्मम दौर में अपने विपक्षी को ससम्मान जगह दे सकता है और विनम्रता से अपनी बात कह सकता है।

हिंस्र स्पर्धी जनतंत्र में विनम्रता वह विरल तत्व है जो दृश्य में उदात्तता पैदा करता है। इन लालची निपट स्वार्थी दिनों में कोई तो है जो पांच मिनट को ही सही, एक उदात्त जनतांत्रिक सीन दे जाता है, जो जनता के बीच मिक्स करता है। अपनी नजर में यही उत्तर आधुनिक रचनात्मक राजनीति है।

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